Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 4 / 51 / 6

क्व॑ स्विदासां कत॒मा पु॑रा॒णी यया॑ वि॒धाना॑ विद॒धुर्ऋ॑भू॒णाम्। शुभं॒ यच्छु॒भ्रा उ॒षस॒श्चर॑न्ति॒ न वि ज्ञा॑यन्ते स॒दृशी॑रजु॒र्याः ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 51 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : उषाः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : क्व॑। स्वि॒त्। आ॒सा॒म्। क॒त॒मा। पु॒रा॒णी। यया॑। वि॒ऽधाना॑। वि॒ऽद॒धुः। ऋ॒भू॒णाम्। शुभ॑म्। यत्। शुभ्राः। उ॒षसः॑। चर॑न्ति। न। वि। ज्ञा॒य॒न्ते॒। स॒ऽदृशीः॑। अ॒जु॒र्याः ॥६॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यत्) जो (शुभ्राः) चमकीली (सदृशीः) तुल्य (अजुर्याः) नहीं जीर्ण अर्थात् नवीन (उषसः) प्रातर्वेलायें (शुभम्) कल्याण को (चरन्ति) प्राप्त होती हैं (आसाम्) इनके मध्य में (कतमा) कौन सी (पुराणी) पुरानी (क्व) किस में (विधाना) करती (यया) जिससे (ऋभूणाम्) बुद्धिमानों का (स्वित्) क्या (विदधुः) विधान करें ऐसा (न) नहीं (वि, ज्ञायन्ते) जाना जाता है, इस प्रकार की स्त्रियों को श्रेष्ठ जानें ॥६॥

भावार्थ : जैसे सम्पूर्ण प्रातर्वेला तुल्य होती हैं, वैसे ही पतियों के साथ सदृश स्त्रियाँ प्रशंसा करने योग्य होती हैं, वह सदा ही युवावस्था में युवा पुरुषों को प्राप्त होकर आनन्दित हों, नहीं जाना जाता है कि कौन नवीन कौन प्राचीन प्रातर्वेला होती है, वैसे ब्रह्मचर्य्य से युक्त कन्या होती हैं ॥६॥