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Rigveda / 4 / 53 / 6

बृ॒हत्सु॑म्नः प्रसवी॒ता नि॒वेश॑नो॒ जग॑तः स्था॒तुरु॒भय॑स्य॒ यो व॒शी। स नो॑ दे॒वः स॑वि॒ता शर्म॑ यच्छत्व॒स्मे क्षया॑य त्रि॒वरू॑थ॒मंह॑सः ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 53 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : सविता | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : बृ॒हत्ऽसु॒म्नः। प्र॒ऽस॒वि॒ता। नि॒ऽवेश॑नः। जग॑तः। स्था॒तुः। उभय॑स्य। यः। व॒शी। सः। नः॒। दे॒वः। स॒वि॒ता। शर्म॑। य॒च्छ॒तु॒। अ॒स्मे इति॑। क्षया॑य। त्रि॒ऽवरू॑थम्। अंह॑सः ॥६॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यः) जो (नः) हम लोगों के लिये (बृहत्सुम्नः) अत्यन्त सुख का (प्रसवीता) उत्पन्न करनेवाला और (जगतः) जङ्गम अर्थात् चेतनता युक्त मनुष्य आदि और (स्थातुः) स्थिर स्थावर अर्थात् नहीं चलने-फिरनेवाले वृक्ष आदि जगत् के (निवेशनः) निवेश अर्थात् स्थिति का करनेवाला (उभयस्य) दो प्रकार के जगत् के (वशी) वश करने को समर्थ (देवः) दाता जगदीश्वर हम लोगों के लिये विद्या को (यच्छतु) देवे (सः) वह (सविता) सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य से युक्त (अस्मे) हम लोगों के (क्षयाय) निवास के लिये (अंहसः) दुःख से अलग हुए (त्रिवरूथम्) तीन गृह जिसमें उस (शर्म) उत्तम प्रकार सुख देनेवाले स्थान को देवे, वही हम लोगों का उपासना करने योग्य देव हो ॥६॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो जगदीश्वर सब जगत् का नियामक और सब जीवों के निवास के लिये अनेक प्रकार के स्थान का रचनेवाला है, उसको छोड़ के अन्य किसी की भी उपासना न करो ॥६॥