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Rigveda / 4 / 54 / 2

दे॒वेभ्यो॒ हि प्र॑थ॒मं य॒ज्ञिये॑भ्योऽमृत॒त्वं सु॒वसि॑ भा॒गमु॑त्त॒मम्। आदिद्दा॒मानं॑ सवित॒र्व्यू॑र्णुषेऽनूची॒ना जी॑वि॒ता मानु॑षेभ्यः ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 54 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : सविता | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर ईश्वर के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : दे॒वे॒भ्यः॑। हि। प्र॒थ॒मम्। य॒ज्ञिये॑भ्यः। अ॒मृ॒त॒ऽत्वम्। सु॒वसि॑। भा॒गम्। उ॒त्ऽत॒मम्। आत्। इत्। दा॒मान॑म्। स॒वि॒तः॒। वि। ऊ॒र्णु॒षे॒। अ॒नू॒ची॒ना। जी॒वि॒ता। मानु॑षेभ्यः ॥२॥

पदार्थ : हे (सवितः) सम्पूर्ण संसार के उत्पन्न करनेवाले जगदीश्वर ! (हि) जिससे आप (यज्ञियेभ्यः) सत्यभाषण आदि यज्ञानुष्ठान करनेवाले (देवेभ्यः) श्रेष्ठ गुण, कर्म्म और स्वभावयुक्त जीवों के लिये (प्रथमम्) पहिले (भागम्) भजने योग्य (उत्तमम्) श्रेष्ठ (अमृतत्वम्) मोक्षसुख की (सुवसि) प्रेरणा करते हो (आत्) इसके अनन्तर (दामानम्) दाता जन को (वि, ऊर्णुषे) अपनी व्याप्ति से ढाँपते हो (अनूचीना) अनुचर (जीविता) जीवनों को (इत्) ही (मानुषेभ्यः) मनुष्यों के लिये देते हो, इससे हम लोगों को उपासना करने योग्य हो ॥२॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो परमात्मा सत्य आचरण में प्रेरणा करता और मुक्तिसुख को देकर सब को आनन्दित करता है, उसी की सदा उपासना करो ॥२॥