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Rigveda / 4 / 54 / 5

इन्द्र॑ज्येष्ठान्बृ॒हद्भ्यः॒ पर्व॑तेभ्यः॒ क्षयाँ॑ एभ्यः सुवसि प॒स्त्या॑वतः। यथा॑यथा प॒तय॑न्तो वियेमि॒र ए॒वैव त॑स्थुः सवितः स॒वाय॑ ते ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 54 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : सविता | छन्द : स्वराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : इन्द्र॑ऽज्येष्ठान्। बृ॒हत्ऽभ्यः॑। पर्व॑तेभ्यः। क्षया॑न्। ए॒भ्यः॒। सु॒व॒सि॒। प॒स्त्य॑ऽवतः। यथा॑ऽयथा। प॒तय॑न्तः। वि॒ऽये॒मि॒रे। ए॒व। ए॒व। त॒स्थुः॒। स॒वि॒त॒रिति॑। स॒वाय॑। ते॒ ॥५॥

पदार्थ : हे (सवितः) जगदीश्वर ! आप (यथायथा) जैसे जैसे (बृहद्भ्यः) बड़े (एभ्यः) इन (पर्वतेभ्यः) मेघादिकों से (पस्त्यावतः) प्रशंसित गृहों से युक्त (इन्द्रज्येष्ठान्) बिजुली वा सूर्य्य बड़े जिनमें उन (क्षयान्) निवासों को (सुवसि) प्रेरणा करते हो, वैसे-वैसे (पतयन्तः) पति के सदृश आचरण करते हुए (एव) ही सब (वियेमिरे) विशेष करके देते हैं और (ते) आपके (सवाय) ऐश्वर्य्य के लिये (एव) ही (तस्थुः) स्थित होते हैं ॥५॥

भावार्थ : हे भगवन् ! आपने सब जीवों के निवासादि व्यवहार के लिये भूमि आदि लोक रचे, इसी से आपके लिये धन्यवादों को समर्पण करके हम लोग आपके ऐश्वर्य्य में निवास करें ॥५॥