Rigveda / 4 / 57 / 4
शु॒नं वा॒हाः शु॒नं नरः॑ शु॒नं कृ॑षतु॒ लाङ्ग॑लम्। शु॒नं व॑र॒त्रा ब॑ध्यन्तां शु॒नमष्ट्रा॒मुदि॑ङ्गय ॥४॥
Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 57 | Mantra No : 4
In English:
Seer : vaamadevo gautamaH | Devta : shunaH | Metre : anuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation Under Process
Verse : shuna.m vaahaaH shuna.m naraH shuna.m kRRiShatu laa~Ngalam. shuna.m varatraa badhyantaa.m shunamaShTraamudi~Ngaya .4.
Component Words : shunam. vaahaaH. shunam. naraH. shunam. kRRiShatu. laa~Ngalam. shunam. varatraaH. badhyantaam. shunam. aShTraam. ut. i~Ngaya .4.
In Hindi:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : शुनः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : शु॒नम्। वा॒हाः। शु॒नम्। नरः॑। शु॒नम्। कृ॒ष॒तु॒। लाङ्ग॑लम्। शु॒नम्। व॒र॒त्राः। ब॑ध्य॒न्ताम्। शु॒नम्। अष्ट्रा॑म्। उत्॑। इ॒ङ्ग॒य॒ ॥४॥
पदार्थ : हे खेती करनेवाले जन ! जैसे (वाहाः) बैल आदि पशु (शुनम्) सुख को प्राप्त हों (नरः) मुखिया कृषीवल (शुनम्) सुख को करें (लाङ्गलम्) हल का अवयव (शुनम्) सुख जैसे हो, वैसे (कृषतु) पृथिवी में प्रविष्ट हो और (वरत्राः) बैल की रस्सी (शुनम्) सुखपूर्वक (बध्यन्ताम्) बाँधी जायें, वैसे (अष्ट्राम्) खेती के साधन के अवयव को (शुनम्) सुखपूर्वक (उत्, इङ्गय) ऊपर चलाओ ॥४॥
भावार्थ : खेती करनेवाले जन उत्तम हल आदि सामग्री, वृषभ और बीजों को इकट्ठे करके खेतों को उत्तम प्रकार जोत कर उनमें उत्तम अन्नों को उत्पन्न करें ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : शुनः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ॥
पदपाठ : शु॒नम्। वा॒हाः। शु॒नम्। नरः॑। शु॒नम्। कृ॒ष॒तु॒। लाङ्ग॑लम्। शु॒नम्। व॒र॒त्राः। ब॑ध्य॒न्ताम्। शु॒नम्। अष्ट्रा॑म्। उत्॑। इ॒ङ्ग॒य॒ ॥४॥
पदार्थ : (शुनम्) सुखम् (वाहाः) वृषभादयः (शुनम्) (नरः) नेतारः कृषीवलाः (शुनम्) (कृषतु) (लाङ्गलम्) हलावयवः (शुनम्) (वरत्राः) रश्मयः (बध्यन्ताम्) (शुनम्) (अष्ट्राम्) कृषिसाधनावयवम् (उत्) (इङ्गय) गमय ॥४॥
अन्वय : हे कृषीवल ! यथा वाहाः शुनं गच्छन्तु नरः शुनं कुर्वन्तु लाङ्गलं शुनं कृषतु वरत्राः शुनं बध्यन्तां तथाऽष्ट्रां शुनमुदिङ्गय ॥४॥
भावार्थ : कृषीवला उत्तमानि हलादिसामग्रीवृषभबीजानि सम्पाद्य क्षेत्राणि सुष्ठु निष्पाद्य तत्रोत्तमान्यन्नानि निष्पादयन्तु ॥४॥