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Rigveda / 4 / 58 / 2

व॒यं नाम॒ प्र ब्र॑वामा घृ॒तस्या॒स्मिन्य॒ज्ञे धा॑रयामा॒ नमो॑भिः। उप॑ ब्र॒ह्मा शृ॑णवच्छ॒स्यमा॑नं॒ चतुः॑शृङ्गोऽवमीद्गौ॒र ए॒तत् ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 58 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः सूर्यो वाऽपो वा गावो वा घृतं वा | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : व॒यम्। नाम॑। प्र। ब्र॒वा॒म॒। घृ॒तस्य॑। अ॒स्मिन्। य॒ज्ञे। धा॒र॒या॒म॒। नमः॑ऽभि। उप॑। ब्र॒ह्मा। शृ॒ण॒व॒त्। श॒स्यमा॑नम्। चतुः॑ऽशृङ्गः। अ॒व॒मी॒त्। गौ॒रः। ए॒तत् ॥२॥

पदार्थ : (चतुःशृङ्गः) चारवेद शृङ्गों अर्थात् शिखरों के सदृश जिसके ऐसा (ब्रह्मा) चार वेदों का जाननेवाला जिस (शस्यमानम्) प्रशंसा करने योग्य को (उप, शृणवत्) समीप में सुने और (गौरः) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी में रमनेवाला जो (अवमीत्) उपदेश देवे सो (एतत्) इस (घृतस्य) जल की (नाम) संज्ञा को (वयम्) हम लोग (प्र, ब्रवाम) उपदेश देवें और (अस्मिन्) इस (यज्ञे) वर्षा आदि जलव्यवहार में (नमोभिः) अन्न आदि पदार्थों से उसको (धारयाम) धारण करावें ॥२॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! चारवेद का जाननेवाला यथार्थवक्ता जन जैसा उपदेश करे और जिस सिद्धान्त का निश्चय करे, वैसे सिद्धान्त का हम लोग भी उपदेश और निश्चय करें ॥२॥