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Rigveda / 4 / 58 / 4

त्रिधा॑ हि॒तं प॒णिभि॑र्गु॒ह्यमा॑नं॒ गवि॑ दे॒वासो॑ घृ॒तमन्व॑विन्दन्। इन्द्र॒ एकं॒ सूर्य॒ एकं॑ जजान वे॒नादेकं॑ स्व॒धया॒ निष्ट॑तक्षुः ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 58 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः सूर्यो वाऽपो वा गावो वा घृतं वा | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अब सूर्यदृष्टान्त से विद्वद्विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : त्रिधा॑। हि॒तम्। प॒णिऽभिः॑। गु॒ह्यमा॑नम्। गवि॑। दे॒वासः॑। घृ॒तम्। अनु॑। अ॒वि॒न्द॒न्। इन्द्रः॑। एक॑म्। सूर्यः॑। एक॑म्। ज॒जा॒न॒। वे॒नात्। एक॑म्। स्व॒धया॑। निः। त॒त॒क्षुः॒ ॥४॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे (देवासः) विद्वान् जन (पणिभिः) प्रशंसित व्यवहार करनेवालों के साथ (गवि) वाणी में (गुह्यमानम्) गुप्त कराया जाता (त्रिधा) तीन प्रकारों से (हितम्) स्थित और (घृतम्) घृत के सदृश आनन्द देनेवाले विज्ञान को (अनु, अविन्दन्) अनुकूल प्राप्त होते और (स्वधया) अपनी धारण की हुई बुद्धि से (निः, ततक्षुः) निरन्तर विस्तार करते हैं। और जैसे (इन्द्रः) बिजुली (वेनात्) सुन्दर परमात्मा के समीप से (एकम्) अव्यक्त अर्थात् प्रकृति को और (सूर्यः) सूर्य (एकम्) एक को (जजान) उत्पन्न करता है, वैसे आप लोग भी (एकम्) निरन्तर सुख अर्थात् मोक्ष को सिद्ध करो ॥४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे श्रेष्ठ व्यवहारों के साथ वर्त्तमान विद्वान् जन, उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी और बुद्धि को तथा बिजुली आदि की विद्या को प्राप्त हो परमेश्वर को जान और उसकी आज्ञा पालन करके सुख का विस्तार करते हैं, वैसे ही सब लोग अच्छा आचरण करें ॥४॥