Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 4 / 58 / 6

स॒म्यक्स्र॑वन्ति स॒रितो॒ न धेना॑ अ॒न्तर्हृ॒दा मन॑सा पू॒यमा॑नाः। ए॒ते अ॑र्षन्त्यू॒र्मयो॑ घृ॒तस्य॑ मृ॒गाइ॑व क्षिप॒णोरीष॑माणाः ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 58 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः सूर्यो वाऽपो वा गावो वा घृतं वा | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उदकविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : स॒म्यक्। स्र॒व॒न्ति॒। स॒रितः॑ न। धेनाः॑। अ॒न्तः। हृ॒दा। मन॑सा। पू॒यमा॑नाः। ए॒ते। अ॒र्ष॒न्ति॒। ऊ॒र्मयः॑। घृ॒तस्य॑। मृ॒गाःऽइ॑व। क्षि॒प॒णोः। ईष॑माणाः ॥६॥

पदार्थ : जिन विद्वानों के (अन्तः, हृदा) अन्तर्विराजमान आत्मा और (मनसा) शुद्ध अन्तःकरण से (पूयमानाः) पवित्रता करती हुई (धेनाः) विद्यायुक्त वाणियाँ (सरितः) नदियों के (न) सदृश (सम्यक्) उत्तम प्रकार (स्रवन्ति) चलती हैं सो (एते) ये विद्वान् (घृतस्य) जल की (ऊर्मयः) लहरियों और (क्षिपणोः) प्रेरणा देनेवाले से (मृगाइव) हरिणों के सदृश (ईषमाणः) चलते हुए सब कीर्ति को (अर्षन्ति) प्राप्त होते हैं ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सत्य कहते हैं वे ही पवित्रात्मा होके जल के सदृश शान्त होते हुए मृगों के सदृश शीघ्र ही अपेक्षित सुख को प्राप्त होते हैं ॥६॥