Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 2 / 7

शुन॑श्चि॒च्छेपं॒ निदि॑तं स॒हस्रा॒द्यूपा॑दमुञ्चो॒ अश॑मिष्ट॒ हि षः। ए॒वास्मद॑ग्ने॒ वि मु॑मुग्धि॒ पाशा॒न्होत॑श्चिकित्व इ॒ह तू नि॒षद्य॑ ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 2 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : कुमार आत्रेयो वृषो वा जार उभौ वा | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : शुनः॑। चि॒त्। शेप॑म्। निऽदि॑तम्। स॒हस्रा॑त्। यूपा॑त्। अ॒मु॒ञ्चः॒। अश॑मिष्ट। हि। सः। ए॒व। अ॒स्मत्। अ॒ग्ने॒। वि। मु॒मु॒ग्धि॒। पाशा॑न्। होत॒रिति॑। चि॒कि॒त्वः॒। इ॒ह। तु। नि॒ऽसद्य॑ ॥७॥

पदार्थ : हे (अग्ने) विद्वन् ! आप (सहस्रात्) असंख्य (यूपात्) मिले वा न मिले हुए बन्धन से (निदितम्) निन्दित (शुनःशेपम्) सुख के प्राप्त कराने और इन्द्रियाराम अर्थात् इन्द्रियों में रमण रखनेवाले को (चित्) भी (अमुञ्चः) त्याग करो (हि) जिससे (सः) वह (अशमिष्ट) शान्त होता (एव) ही है। हे (होतः) हवन करनेवाले (चिकित्व) बुद्धिमान् ! (इह) यहाँ युक्तधर्म्म सम्बन्धी व्यवहार में (निषद्य) प्रवृत्त होकर (अस्मत्) हम लोगों से (पाशान्) संसाररूप बन्धनों को (तू) फिर (वि, मुमुग्धि) काटिये ॥७॥

भावार्थ : विद्वानों का यही आवश्यक कर्म्म है, जो सब मनुष्यों को अविद्या और अधर्म्माचरण से अलग कर विद्वान् धार्मिक बना उनका दुःखबन्धन छुड़ाना निरन्तर करना चाहिये ॥७॥