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Rigveda / 5 / 3 / 5

न त्वद्धोता॒ पूर्वो॑ अग्ने॒ यजी॑या॒न्न काव्यैः॑ प॒रो अ॑स्ति स्वधावः। वि॒शश्च॒ यस्या॒ अति॑थि॒र्भवा॑सि॒ स य॒ज्ञेन॑ वनवद्देव॒ मर्ता॑न् ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 3 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : वसुश्रुत आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर राजधर्म को कहते हैं ॥

पदपाठ : न। त्वत्। होता॑। पूर्वः॑। अ॒ग्ने॒। यजी॑यान्। न। काव्यैः॑। प॒रः। अ॒स्ति॒। स्व॒धा॒ऽवः॒। वि॒शः। च॒। यस्याः॑। अति॑थिः। भवा॑सि। सः। य॒ज्ञेन॑। व॒न॒व॒त्। दे॒व॒। मर्ता॑न् ॥५॥

पदार्थ : हे (स्वधावः) बहुत धन और धान्य से युक्त (देव) सुख के देनेवाले (अग्ने) विद्वान् वा राजन् ! आप (यज्ञेन) प्रजापालनरूप व्यवहार से (मर्त्तान्) मनुष्यों का (वनवत्) सेवन करते हो (न) न (त्वत्) आपके समीप से (पूर्वः) प्राचीन (होता) दाता (यजीयान्) अत्यन्त यज्ञ करनेवाला (अस्ति) है और (न) न (काव्यैः) कवियों के बनाये हुओं से (परः) श्रेष्ठ है (यस्याः) जिस (विशः) प्रजा के (च) भी (अतिथिः) आदर करने योग्य जो आप (भवासि) होवें (सः) वह आप उस प्रजा के सत्कार करने योग्य हैं ॥५॥

भावार्थ : जो राजा धर्मयुक्त व्यवहार से प्रजाओं का पालन करे, वही राज्य करने के योग्य होता है ॥५॥