Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 3 / 11

त्वम॒ङ्ग ज॑रि॒तारं॑ यविष्ठ॒ विश्वा॑न्यग्ने दुरि॒ताति॑ पर्षि। स्ते॒ना अ॑दृश्रन्रि॒पवो॒ जना॒सोऽज्ञा॑तकेता वृजि॒ना अ॑भूवन् ॥११॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 3 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : वसुश्रुत आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब चोरी आदि दोषनिवारण, सन्तानशिक्षाकरण, प्रजाधर्मविषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : त्वम्। अ॒ङ्ग। ज॒रि॒ता॑रम्। य॒वि॒ष्ठ॒। विश्वा॑नि। अ॒ग्ने॒। दुः॒ऽइ॒ता। अति॑। प॒र्षि॒। स्ते॒नाः। अ॒दृ॒श्र॒न्। रि॒पवः॑। जना॑सः। अज्ञा॑तऽकेताः। वृ॒जि॒नाः। अ॒भू॒व॒न् ॥११॥

पदार्थ : हे (यविष्ठ) अतिशय करके युवा (अङ्ग) मित्र (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान जिससे (त्वम्) आप (जरितारम्) विद्या और गुण की स्तुति करनेवाले पिता की (अति, पर्षि) अत्यन्त पालना करते हो (विश्वानि) सम्पूर्ण (दुरिता) दुःख के प्राप्त करानेवाले कर्म्म वा फलों का त्याग करते हो और जो (अज्ञातकेताः) नहीं जानी बुद्धि जिन्होंने वे मूर्ख (वृजिनाः) पापाचरणयुक्त वर्जने योग्य (स्तेनाः) चोर (रिपवः) शत्रु (अभूवन्) होते हैं और जिनको (जनासः) विद्वान् जन (अदृश्रन्) देखते हैं, उनका आप परित्याग करो ॥११॥

भावार्थ : हे उत्तम सन्तानो ! आप लोग दुष्ट आचरणों का त्याग, माता-पितादि का सत्कार और चौरी कर्म्म आदि का निवारण करके पुण्य यशवाले हूजिये ॥११॥