Rigveda / 5 / 5 / 3
ई॒ळि॒तो अ॑ग्न॒ आ व॒हेन्द्रं॑ चि॒त्रमि॒ह प्रि॒यम्। सु॒खै रथे॑भिरू॒तये॑ ॥३॥
Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 5 | Mantra No : 3
In English:
Seer : vasushruta aatreyaH | Devta : aapriyaH | Metre : nichRRidgaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : iiLito agna aa vahendra.m chitramiha priyam. sukhai rathebhiruutaye .3.
Component Words : iiLitaH. agne. aa. vaha. indram. chitram. iha. priyam. su.akhaiH. rathebhiH. uutaye .3.
In Hindi:
ऋषि : वसुश्रुत आत्रेयः | देवता : आप्रियः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : अब राजविषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : ई॒ळि॒तः। अ॒ग्ने॒। आ। व॒ह॒। इन्द्र॑म्। चि॒त्रम्। इ॒ह। प्रि॒यम्। सु॒ऽखैः। रथे॑भिः। ऊ॒तये॑ ॥३॥
पदार्थ : हे (अग्ने) आत्मप्रकाशस्वरूप (ईळितः) प्रशंसा किये गये आप (इह) इस संसार में (सुखैः) सुखकारक (रथेभिः) वाहनों से (ऊतये) रक्षण आदि के लिये (चित्रम्) अद्भुत (प्रियम्) मनोहर (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य्य को (आ, वह) सब प्रकार से प्राप्त कीजिये ॥३॥
भावार्थ : हे राजन् ! आप बड़े ऐश्वर्य्य को प्राप्त होके प्रजा के रक्षण के लिये सर्वत्र भ्रमण कीजिये ॥३॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसुश्रुत आत्रेयः | देवता : आप्रियः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : अथ राजविषयमाह ॥
पदपाठ : ई॒ळि॒तः। अ॒ग्ने॒। आ। व॒ह॒। इन्द्र॑म्। चि॒त्रम्। इ॒ह। प्रि॒यम्। सु॒ऽखैः। रथे॑भिः। ऊ॒तये॑ ॥३॥
पदार्थ : (ईळितः) प्रशंसितः (अग्ने) प्रकाशात्मन् (आ) (वह) समन्तात् प्राप्नुहि (इन्द्रम्) परमैश्वर्यम् (चित्रम्) अद्भुतम् (इह) संसारे (प्रियम्) कमनीयम् (सुखैः) सुखकारकैः (रथेभिः) यानैः (ऊतये) रक्षणाद्याय ॥३॥
अन्वय : हे अग्ने ! ईळितस्त्वमिह सुखै रथेभिरूतये चित्रं प्रियमिन्द्रमा वह ॥३॥
भावार्थ : राजँस्त्वं महैश्वर्य्यं प्राप्य प्रजारक्षणाय सर्वत्र भ्रम ॥३॥