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Rigveda / 5 / 6 / 5

आ ते॑ अग्न ऋ॒चा ह॒विः शुक्र॑स्य शोचिषस्पते। सुश्च॑न्द्र॒ दस्म॒ विश्प॑ते॒ हव्य॑वा॒ट् तुभ्यं॑ हूयत॒ इषं॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 6 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : वसुश्रुत आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : आ। ते॒। अ॒ग्ने॒। ऋ॒चा। ह॒विः। शुक्र॑स्य। शो॒चि॒षः॒। पते॒। सुऽच॑न्द्र। दस्म॑। विश्प॑ते। हव्य॑ऽवाट्। तुभ्य॑म्। हू॒य॒ते॒। इष॑म्। स्तो॒तृऽभ्यः॑। आ। भ॒र॒ ॥५॥

पदार्थ : हे (शोचिषः, पते) प्रकाश के स्वामिन् (सुश्चन्द्र) अच्छे सुवर्ण से युक्त (दस्म) दुःख के नाश करनेवाले (विश्पते) प्रजाओं के पालक (अग्ने) विद्वान् राजन् ! (शुक्रस्य) शुद्ध (ते) आपकी (ऋचा) प्रशंसा से (हविः) देने योग्य पदार्थ (आ) सब प्रकार से (हूयते) दिया जाता है और हे (हव्यवाट्) देने योग्य वस्तु के देनेवाले ! (तुभ्यम्) आपके लिये सुख दिया जाता है, वह आप (स्तोतृभ्यः) स्तुति करनेवालों के लिये (इषम्) अन्न को (आ, भर) अच्छे प्रकार धारण कीजिये ॥५॥

भावार्थ : जो विद्वान् लोग अग्नि आदिकों से कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, उनके काम सिद्ध होते हैं ॥५॥