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Rigveda / 5 / 7 / 6

यं मर्त्यः॑ पुरु॒स्पृहं॑ वि॒दद्विश्व॑स्य॒ धाय॑से। प्र स्वाद॑नं पितू॒नामस्त॑तातिं चिदा॒यवे॑ ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 7 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : इष आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : स्वराडुष्निक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर विद्वानों के विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : यम्। मर्त्यः॑। पु॒रु॒ऽस्पृह॑म्। वि॒दत्। विश्व॑स्य। धाय॑से। प्र। स्वाद॑नम्। पि॒तू॒नाम्। अस्त॑ऽतातिम्। चि॒त्। आ॒यवे॑ ॥६॥

पदार्थ : (मर्त्यः) मनुष्य (आयवे) मनुष्य के लिये और (विश्वस्य) संसार के (धायसे) धारण के लिये (यम्) जिस (पुरुस्पृहम्) बहुतों से प्रशंसा करने योग्य (पितूनाम्) अन्नों के (स्वादनम्) स्वाद और (अस्ततातिम्) गृहस्थ को (चित्) भी (प्र, विदत्) प्राप्त होवे, उसको परोपकार के लिये धारण करे ॥६॥

भावार्थ : मनुष्य को जिस उत्तम वस्तु और ज्ञान की प्राप्ति होवे, उस उसको सब के सुख के लिये धारण करे ॥६॥