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Rigveda / 5 / 7 / 10

इति॑ चिन्म॒न्युम॒ध्रिज॒स्त्वादा॑त॒मा प॒शुं द॑दे। आद॑ग्ने॒ अपृ॑ण॒तोऽत्रिः॑ सासह्या॒द्दस्यू॑नि॒षः सा॑सह्या॒न्नॄन् ॥१०॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 7 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : इष आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृद्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : अब अग्निशब्दार्थ राजविषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : इति॑। चि॒त्। म॒न्युम्। अ॒ध्रिजः॑। त्वाऽदा॑तम्। आ। प॒शुम्। द॒दे॒। आत्। अ॒ग्ने॒। अ॑पृणतः। अत्रिः॑। स॒स॒ह्या॒त्। दस्यू॑न्। इ॒षः। स॒स॒ह्या॒त्। नॄन् ॥१०॥

पदार्थ : हे (अग्ने) विद्वन् ! (अध्रिजः) धारण करनेवालों में उत्पन्न आप (मन्युम्) क्रोध को (सासह्यात्) निरन्तर सहें (अत्रिः) निरन्तर पुरुषार्थी आप (अपृणतः) नहीं पालन करते हुए (दस्यून्) दुष्ट साहस करनेवाले चोरों को (सासह्यात्) निरन्तर सहें और (आत्) सब ओर से (इषः) इच्छाओं और (नॄन्) नीति से युक्त मनुष्यों को निरन्तर सहें (इति) इस प्रकार वर्त्तमान (चित्) भी (त्वादातम्) आपसे देने योग्य (पशुम्) पशु को मैं (आ, ददे) ग्रहण करता हूँ ॥१०॥

भावार्थ : जो राजजन क्रोधादि और दुष्ट व्यसनों का निवारण करके चोर डाकुओं को जीत कर श्रेष्ठ पुरुषों से किये गये अपमान को सहें, वे अखण्डित राज्य युक्त होते हैं ॥१०॥ इस सूक्त में मित्रत्व, विद्वान्, राजा और अग्नि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह सप्तम सूक्त और पच्चीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥