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Rigveda / 5 / 9 / 5

अध॑ स्म॒ यस्या॒र्चयः॑ स॒म्यक्सं॒यन्ति॑ धू॒मिनः॑। यदी॒मह॑ त्रि॒तो दि॒व्युप॒ ध्माते॑व॒ धम॑ति॒ शिशी॑ते ध्मा॒तरी॑ यथा ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 9 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : गय आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : स्वराड्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अध॑। स्म॒। यस्य॑। अ॒र्चयः॑। स॒म्यक्। स॒मऽयन्ति॑। धू॒मिनः॑। यत्। ई॒म्। अह॑। त्रि॒तः। दि॒वि। उप॑। ध्माता॑ऽइव। धम॑ति। शिशी॑ते। ध्मा॒तरि॑। य॒था॒ ॥५॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यस्य) जिस अग्नि के (अर्चयः) तेज (धूमिनः) बहुत धूम से युक्त (संयन्ति) उत्तम प्रकार प्राप्त होते हैं (अध) इसके अनन्तर (यत्) जो (ईम्) सब ओर से (अह) निश्चय ग्रहण करने में (त्रितः) अच्छे प्रकार ले जानेवाला हुआ (दिवि) अन्तरिक्ष में (ध्मातेव) शब्द करनेवाले के सदृश (उप, धमति) शब्द करता है और (यथा) जैसे (ध्मातरी) चलनेवाले में (सम्यक्) उत्तम प्रकार (शिशीते) सूक्ष्म करता है, उससे वैसे (स्म) ही कार्यों को सिद्ध करो ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! सब पदार्थविद्याओं से पहले अग्निविद्या जाननी चाहिये ॥५॥