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Rigveda / 5 / 10 / 4

ये अ॑ग्ने चन्द्र ते॒ गिरः॑ शु॒म्भन्त्यश्व॑राधसः। शुष्मे॑भिः शु॒ष्मिणो॒ नरो॑ दि॒वश्चि॒द्येषां॑ बृ॒हत्सु॑की॒र्तिर्बोध॑ति॒ त्मना॑ ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 10 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : गय आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : स्वराड्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर विद्वद्विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : ये। अ॒ग्ने॒। च॒न्द्र॒। ते॒। गिरः॑। शु॒म्भन्ति॑। अश्व॑ऽराधसः। शु॒ष्मे॑भिः। शु॒ष्मिणः॒। नरः॑। दि॒वः। चि॒त्। येषा॑म्। बृ॒हत्। सु॒ऽकी॒र्त्तिः। बोध॑ति। त्मना॑ ॥४॥

पदार्थ : हे (चन्द्र) आनन्द देनेवाले (अग्ने) विद्वन् ! (ते) आपकी (अश्वराधसः) बिजुली आदि पदार्थों की सिद्धि करनेवाली (गिरः) धर्मसम्बन्धिनी वाणियों को (ये) जो (शुष्मेभिः) बलों के साथ (शुष्मिणः) बली (दिवः) कामना करते हुए (चित्) भी (नरः) मुख्य नायकजन (शुम्भन्ति) विराजते हैं और (येषाम्) जिनकी इन वाणियों को (बृहत्, सुकीर्त्तिः) बड़ी उत्तम प्रशंसायुक्त आप (त्मना) आत्मा से (बोधति) जानते हैं, वे मित्र हों ॥४॥

भावार्थ : जो विद्वान् सदृश गुण, कर्म और स्वभाववाले मित्र होकर अग्नि आदि पदार्थों की विद्याओं को परस्पर जनाते हैं, वे सिद्ध मनोरथवाले होते हैं ॥४॥