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Rigveda / 5 / 12 / 3

कया॑ नो अग्न ऋ॒तय॑न्नृ॒तेन॒ भुवो॒ नवे॑दा उ॒चथ॑स्य॒ नव्यः॑। वेदा॑ मे दे॒व ऋ॑तु॒पा ऋ॑तू॒नां नाहं पतिं॑ सनि॒तुर॒स्य रा॒यः ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 12 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : सुतम्भर आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर अग्निपदवाच्य विद्वद्विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : कया॑। नः॒। अ॒ग्ने॒। ऋ॒तय॑न्। ऋ॒तेन॑। भुवः॑। नवे॑दाः। उ॒चथ॑स्य। नव्यः॑। वेद॑। मे॒। दे॒वः। ऋ॒तु॒ऽपाः। ऋ॒तू॒नाम्। न। अ॒हम्। पति॑म्। स॒नि॒तुः। अ॒स्य। रा॒यः ॥३॥

पदार्थ : हे (अग्ने) विद्वन् ! आप (कया) किस विद्या वा युक्ति से (नः) हम लोगों को जनावें (ऋतेन) सत्य से (ऋतयन्) सत्य का आचरण करता हुआ (भुवः) पृथिवी का (नवेदाः) नहीं प्राप्त होनेवाला (उचथस्य) उचित का सम्बन्धी (नव्यः) नवीनों में श्रेष्ठ (ऋतुपाः) ऋतुओं का पालन करनेवाला पृथ्वीसम्बन्धी (देवः) विद्वान् (अहम्) मैं (ऋतूनाम्) वसन्त आदि ऋतुओं और (अस्य) इस (सनितुः) विभाग करनेवाले (रायः) धन के (पतिम्) स्वामी का (न) नहीं नाश कराता हूँ, वैसे आप (मे) मुझ को (वेदा) जानिये और मुझ को नष्ट मत करिये ॥३॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! सत्य के आचरण से ही पृथ्वी का राज्य प्राप्त होता है और पृथ्वी के राज्य और लक्ष्मी से सब को सुख होता है ॥३॥