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Rigveda / 5 / 15 / 1

प्र वे॒धसे॑ क॒वये॒ वेद्या॑य॒ गिरं॑ भरे य॒शसे॑ पू॒र्व्याय॑। घृ॒तप्र॑सत्तो॒ असु॑रः सु॒शेवो॑ रा॒यो ध॒र्ता ध॒रुणो॒ वस्वो॑ अ॒ग्निः ॥१॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 15 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : धरुण आङ्गिरसः | देवता : अग्निः | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब पाँच ऋचावाले पन्द्रहवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् और अग्निगुणविषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : प्र। वे॒धसे॑। क॒वये॑। वेद्या॑य। गिर॑म्। भ॒रे॒। य॒शसे॑। पू॒र्व्याय॑। घृ॒तऽप्र॑सत्तः। असु॑रः। सु॒ऽशेवः॑। रा॒यः। ध॒र्ता। ध॒रुणः॑। वस्वः॑। अ॒ग्निः ॥१॥

पदार्थ : हे विद्वानो ! जैसे मुझ को (घृतप्रसत्तः) जल में प्रसक्त होने (असुरः) और प्राणों में सुख देनेवाला तथा (सुशेवः) सुन्दर सुख जिसमें ऐसे (रायः) धन का (धर्त्ता) धारण करने और (वस्वः) पृथिवी आदि का (धरुणः) धारण करनेवाला (अग्निः) अग्नि धारण किया जाता है, उसके बोध के लिये (कवये) विद्वान् और (वेद्याय) जानने योग्य के लिये और (यशसे) प्रशंसित (पूर्व्याय) प्राचीनों में प्राप्त विद्यावाले (वेधसे) बुद्धिमान् के लिये (गिरम्) वाणी को (प्र, भरे) धारण करता हूँ, वैसे आप लोग भी इसको इसलिये धारण करो ॥१॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो ! जो अग्नि आदि पदार्थों की विद्या असाधारण अर्थात् विलक्षण है, उसको उत्तम लक्षणवाले बुद्धिमान् विद्यार्थियों के लिये ग्रहण कराइये ॥१॥