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Rigveda / 5 / 15 / 5

वाजो॒ नु ते॒ शव॑सस्पा॒त्वन्त॑मु॒रुं दोधं॑ ध॒रुणं॑ देव रा॒यः। प॒दं न ता॒युर्गुहा॒ दधा॑नो म॒हो रा॒ये चि॒तय॒न्नत्रि॑मस्पः ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 15 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : धरुण आङ्गिरसः | देवता : अग्निः | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : वाजः॑। नु। ते॒। शव॑सः। पा॒तु॒। अन्त॑म्। उ॒रुम्। दोध॑म्। ध॒रुण॑म्। दे॒व॒। रा॒यः। प॒दम्। न। ता॒युः। गुहा॑। दधा॑नः। म॒हः। रा॒ये। चि॒तय॑न्। अत्रि॑म्। अ॒स्प॒रित्य॑स्पः ॥५॥

पदार्थ : हे (देव) विद्वन् (ते) आपका (वाजः) वेग (शवसः) बल के (उरुम्) बहुत (अन्तम्) अन्त की (दोधम्) तथा उत्तम पूर्ण करनेवाले और (रायः) धन के (धरुणम्) धारण करनेवाले की (नु) शीघ्र (पातु) रक्षा करे और (तायुः) चोर (पदम्) पैरों के चिह्न को (न) जैसे वैसे (महः) बड़े (राये) धन के लिये (गुहा) बुद्धि में सत्य को (दधानः) धारण करते और (अत्रिम्) पालन करनेवाले को (चितयन्) जनाते हुए आप सब को (अस्पः) प्रसन्न कीजिये ॥५॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे चोर, चोर के पाद के चिह्न को ढूँढ के ग्रहण करता है, वैसे ही आत्माओं में सत्य को धारण कर और कामना की पूर्ति करके सब को प्रसन्न करें ॥५॥ इस सूक्त में विद्वान् और अग्नि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह पन्द्रहवाँ सूक्त और सप्तम वर्ग समाप्त हुआ ॥