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Rigveda / 1 / 32 / 10

अति॑ष्ठन्तीनामनिवेश॒नानां॒ काष्ठा॑नां॒ मध्ये॒ निहि॑तं॒ शरी॑रम् । वृ॒त्रस्य॑ नि॒ण्यं वि च॑र॒न्त्यापो॑ दी॒र्घं तम॒ आश॑य॒दिन्द्र॑शत्रुः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 32 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उस मेघ का शरीर कैसा और कहाँ स्थित होता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

पदपाठ : अति॑ष्ठन्तीनाम् । अ॒नि॒ऽवे॒श॒नाना॑म् । काष्ठा॑नाम् । मध्ये॑ । निऽहि॑तम् । शरी॑रम् । वृ॒त्रस्य॑ । नि॒ण्यम् । वि । च॒र॒न्ति॒ । आपः॑ । दी॒र्घम् । तमः॑ । आ । अ॒श॒य॒त् । इन्द्र॑ऽशत्रुः॥

पदार्थ : हे सभा स्वामिन् ! तुम को चाहिये कि जिस (वृत्रस्य) मेघ के (अनिवेशनानाम्) जिनको स्थिरता नहीं होती (अतिष्ठन्तीनाम्) जो सदा बहनेवाले हैं उन जलों के बीच (निण्यम्) निश्चय करके स्थिर (शरीरम्) जिसका छेदन होता है ऐसा शरीर है वह (काष्ठानाम्) सब दिशाओं के बीच (निहितम्) स्थित होता है। तथा जिसके शरीर रूप (अपः) जल (दीर्घम्) बड़े (तमः) अन्धकार रूप घटाओं में (विचरन्ति) इधर-उधर जाते आते है वह (इन्द्रशत्रुः) मेघ उन जलों में इकट्ठा वा अलग-२ छोटा-२ बदल रूप होके (अशयत्) सोता है। वैसे ही प्रजा के द्रोही शत्रुओं को उनके सहायियों के सहित बांध के सब दिशाओं सुलाना चाहिये ॥१०॥

भावार्थ : इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सभापति को योग्य है कि जैसे यह मेघ अन्तरिक्ष में ठहरानेवाले जलों में सूक्ष्मपन में नहीं दीखता फिर जब घन के आकार वर्षा के द्वारा जल का समुदाय रूप होता है तब वह देखने में आता है और जैसे वे जल एक क्षणभर भी स्थिति को नहीं पाते हैं किन्तु सब काल में ऊपर जाना वा नीचे आना इस प्रकार घूमते ही रहते हैं और जो मेघ के शरीर रूप हैं वे अन्तरिक्ष में रहते हुए अति सूक्ष्म होने से नहीं दीख पड़ते वैसे बड़े-२ बलवाले शत्रुओं को भी अल्प बलवाले करके वशीभूत किया करे ॥१०॥