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Rigveda / 5 / 18 / 5

ये मे॑ पञ्चा॒शतं॑ द॒दुरश्वा॑नां स॒धस्तु॑ति। द्यु॒मद॑ग्ने॒ महि॒ श्रवो॑ बृ॒हत्कृ॑धि म॒घोनां॑ नृ॒वद॑मृत नृ॒णाम् ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 18 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : दितो मृतवाहा आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिग्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : ये। मे॒। प॒ञ्चा॒शत॑म्। द॒दुः। अश्वा॑नाम्। स॒धऽस्तु॑ति। द्यु॒ऽमत्। अ॒ग्ने॒। महि॑। श्रवः॑। बृ॒हत्। कृ॒धि॒। म॒घोना॑म्। नृ॒ऽवत्। अ॒मृ॒त॒। नृ॒णाम् ॥५॥

पदार्थ : (ये) जो अतिथि जन (मे) मेरे लिये (अश्वानाम्) वेग से युक्त अग्नि आदि पदार्थों के (सधस्तुति) साथ प्रशंसित (द्युमत्) यथार्थ ज्ञान के प्रकाश से युक्त (पञ्चाशतम्) पञ्चाशत् संख्यायुक्त विज्ञान को (ददुः) देनेवाले हों, उनके साथ हे (अग्ने) विद्वन् ! आप एक साथ प्रशंसित और यथार्थ ज्ञान के प्रकाश से युक्त (महि) बड़े (बृहत्) बहुत (श्रवः) अन्न वा श्रवण को (कृधि) करिये और हे (अमृत) मरणधर्म्म से रहित ! उन (मघोनाम्) बहुत धनवान् (नृणाम्) मनुष्यों के (नृवत्) मनुष्यों के तुल्य उन्नति का विधान करो ॥५॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो अतिथिजन पदार्थविद्या को देवें, उनका सत्कार यथायोग्य करो ॥५॥ इस सूक्त में अग्निवत् अतिथि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह अठारहवाँ सूक्त और दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥