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Rigveda / 5 / 22 / 3

चि॒कि॒त्विन्म॑नसं त्वा दे॒वं मर्ता॑स ऊ॒तये॑। वरे॑ण्यस्य॒ तेऽव॑स इया॒नासो॑ अमन्महि ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 22 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : विश्वसामा आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : स्वराडुष्निक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : चि॒कि॒त्वित्ऽम॑नसम्। त्वा॒। दे॒वम्। मर्ता॑सः। ऊ॒तये॑। वरे॑ण्यस्य। ते॒। अव॑सः। इ॒या॒नासः॑। अ॒म॒न्म॒हि॒ ॥३॥

पदार्थ : हे विद्वन् ! (वरेण्यस्य) स्वीकार करने और (अवसः) कामना करने योग्य (ते) आपके सङ्ग से (इयानासः) प्राप्त होते हुए (मर्त्तासः) मनुष्य हम लोग (ऊतये) रक्षा आदि के लिये (चिकित्विन्मनसम्) विज्ञानयुक्त पुरुषों के मन के सदृश मन से युक्त (देवम्) विद्वान् (त्वा) आपको अग्नि के सदृश (अमन्महि) विशेष करके जानें ॥३॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि सदा ही विद्वानों के सङ्ग से पदार्थविद्या का खोज करें ॥३॥