Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 25 / 2

स हि स॒त्यो यं पूर्वे॑ चिद्दे॒वास॑श्चि॒द्यमी॑धि॒रे। होता॑रं म॒न्द्रजि॑ह्व॒मित्सु॑दी॒तिभि॑र्वि॒भाव॑सुम् ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 25 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : बन्धुः सुबन्धुः श्रुतबन्धुर्विप्रबन्धुश्च गौपयाना लौपयाना वा | देवता : अग्निः | छन्द : पूर्वार्द्धस्योत्तरार्द्धस्य च भुरिग्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : अब अग्निदृष्टान्त से राजविषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : सः। हि। स॒त्यः। यम्। पूर्वे॑। चि॒त्। दे॒वासः॑। चि॒त्। यम्। ई॒धि॒रे। होता॑रम्। म॒न्द्रजि॑ह्वम्। इत्। सु॒दी॒तिऽभिः॑। वि॒भाव॑सुम् ॥२॥

पदार्थ : (पूर्वे) प्राचीन (देवासः) विद्वान् जन (यम्) जिस (होतारम्) देनेवाले (मन्द्रजिह्वम्) प्रशंसनीय जिह्वा से युक्त (सुदीतिभिः) उत्तम प्रकाशों के सहित वर्त्तमान को (चित्) और (विभावसुम्) प्रकाशित धन से युक्त अग्नि के सदृश वर्त्तमान (यम्) जिस राजा को (चित्) निश्चय से (इत्) ही (ईधिरे) प्रकाशित करते हैं (सः, हि) वही (सत्यः) सज्जनों में श्रेष्ठ पुरुष राज्य करने को योग्य है ॥२॥

भावार्थ : जिस राजा का यथार्थवक्ता जन सत्कार करें, वही निरन्तर राज्य की रक्षा और वृद्धि करने को योग्य हो ॥२॥