Rigveda / 5 / 26 / 3
वी॒तिहो॑त्रं त्वा कवे द्यु॒मन्तं॒ समि॑धीमहि। अग्ने॑ बृ॒हन्त॑मध्व॒रे ॥३॥
Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 26 | Mantra No : 3
In English:
Seer : vasuyava aatreyaH | Devta : agniH | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : viitihotra.m tvaa kave dyumanta.m samidhiimahi. agne bRRihantamadhvare .3.
Component Words : viiti.ahotram. tvaa. kave. dyu.amantam. sam. idhiimahi. agne. bRRihantam. adhvare .3.
In Hindi:
ऋषि : वसुयव आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : फिर अग्नि के सादृश्य से विद्वान् के गुणों को कहते हैं ॥
पदपाठ : वी॒तिऽहो॑त्रम्। त्वा॒। क॒वे॒। द्यु॒ऽमन्त॑म्। सम्। इ॒धी॒म॒हि॒। अग्ने॑। बृ॒हन्त॑म्। अ॒ध्व॒रे ॥३॥
पदार्थ : हे (कवे) विद्वन् (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान ! हम लोग (अध्वरे) अहिंसारूप यज्ञ में (वीतिहोत्रम्) व्याप्ति का ग्रहण जिससे उस (द्युमन्तम्) प्रकाशवाले अग्नि के सदृश जिन (बृहन्तम्) महान् (त्वा) आपको (सम्, इधीमहि) उत्तम प्रकार प्रकाशित करें, वह आप हम लागों को शुद्ध विद्या से प्रकाशित करें ॥३॥
भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि शिल्पविद्या की सिद्धि के लिये अग्नि का सम्प्रयोग अवश्य करें ॥३॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसुयव आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : पुनरग्निसादृश्येन विद्वद्गुणानाह ॥
पदपाठ : वी॒तिऽहो॑त्रम्। त्वा॒। क॒वे॒। द्यु॒ऽमन्त॑म्। सम्। इ॒धी॒म॒हि॒। अग्ने॑। बृ॒हन्त॑म्। अ॒ध्व॒रे ॥३॥
पदार्थ : (वीतिहोत्रम्) वीतेर्व्याप्तेर्होत्रं ग्रहणं यस्मात् तम् (त्वा) (कवे) विद्वन् (द्युमन्तम्) प्रकाशवन्तम् (सम्) (इधीमहि) सम्यक् प्रकाशयेम (अग्ने) पावकवद्वर्त्तमान (बृहन्तम्) महान्तम् (अध्वरे) अहिंसायज्ञे ॥३॥
अन्वय : हे कवे अग्ने ! वयमध्वरे [वीतिहोत्रं] द्युमन्तमग्निमिव यं बृहन्तं त्वा समिधीमहि स त्वमस्माञ्छुद्धविद्यया प्रकाशय ॥३॥
भावार्थ : अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः । मनुष्यैः शिल्पविद्यासिद्धयेऽग्निसम्प्रयोगोऽवश्यं कार्य्यः ॥३॥