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Rigveda / 5 / 26 / 9

एदं म॒रुतो॑ अ॒श्विना॑ मि॒त्रः सी॑दन्तु॒ वरु॑णः। दे॒वासः॒ सर्व॑या वि॒शा ॥९॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 26 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : वसुयव आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : आ॒। इ॒दम्। म॒रुतः॑। अ॒श्विना॑। मि॒त्रः। सी॒द॒न्तु॒। वरु॑णः। दे॒वासः॑। सर्व॑या। वि॒शा ॥९॥

पदार्थ : (मरुतः) मनुष्य (मित्रः) मित्र (वरुण) सब में उत्तम (अश्विना) अध्यापक और उपदेशक तथा (देवासः) विद्वान् जन (सर्वया) सम्पूर्ण (विशा) प्रजा से (इदम्) इस आसन पर (आ, सीदन्तु) विराजें ॥९॥

भावार्थ : राजा और श्रेष्ठ जन न्यायासन पर विराज के अन्याय और पक्षपात का त्याग और न्याय करके प्रजाओं के प्रिय होवें ॥९॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह छब्बीसवाँ सूक्त और बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥