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Rigveda / 5 / 27 / 2

यो मे॑ श॒ता च॑ विंश॒तिं च॒ गोनां॒ हरी॑ च यु॒क्ता सु॒धुरा॒ ददा॑ति। वैश्वा॑नर॒ सुष्टु॑तो वावृधा॒नोऽग्ने॒ यच्छ॒ त्र्य॑रुणाय॒ शर्म॑ ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 27 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : वसुयव आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर विद्वान् के गुणों को कहते हैं ॥

पदपाठ : यः। मे॒। श॒ता। च॒। विं॒॒श॒तिम्। च॒। गोना॑म्। हरी॒ इति॑। च॒। यु॒क्ता। सु॒ऽधुरा॑। ददा॑ति। वैश्वा॑नर। सुऽस्तु॑तः। व॒वृ॒धा॒नः। अग्ने॑। यच्छ॑। त्रिऽअ॑रुणाय। शर्म॑ ॥२॥

पदार्थ : हे (वैश्वानर) सब में प्रकाशमान (अग्ने) विद्वन् (यः) जो (सुष्टुतः) उत्तम प्रकार प्रशंसा किया गया (वावृधानः) अत्यन्त बढ़ता अर्थात् वृद्धि को प्राप्त होता हुआ (मे) मेरे (गोनाम्) गौओं के (शता) सैकड़ौं (च) और (विंशतिम्) बीसों संख्यावाले समूह को (च) और (युक्ता) युक्त (सुधुरा) उत्तम धुरा जिनमें उन (हरी) ले चलनेवाले घोड़ों को (च) भी (ददाति) देता है उस (त्र्यरुणाय) तीन गुणोंवाले पुरुष के लिये आप (शर्म्म) गृह वा सुख को (यच्छ) दीजिये ॥२॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो गौ, घोड़ा और हस्ति आदि पशुओं के पालन करनेवाले होवें, उनके लिये यथायोग्य मासिक [वृत्ति] दीजिये ॥२॥