Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 29 / 5

अध॒ क्रत्वा॑ मघव॒न्तुभ्यं॑ दे॒वा अनु॒ विश्वे॑ अददुः सोम॒पेय॑म्। यत्सूर्य॑स्य ह॒रितः॒ पत॑न्तीः पु॒रः स॒तीरुप॑रा॒ एत॑शे॒ कः ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 29 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : गौरिवीतिः शाक्त्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब विद्वद्विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अध॑। क्रत्वा॑। म॒घ॒ऽव॒न्। तुभ्य॑म्। दे॒वाः। अनु॑। विश्वे॑। अ॒द॒दुः॒। सोम॒ऽपेय॑म्। यत्। सूर्य॑स्य। ह॒रितः। पत॑न्तीः। पु॒रः। स॒तीः। उप॑राः। एत॑शे। क॒रिति॒ कः ॥५॥

पदार्थ : हे (मघवन्) बहुत धन से युक्त ! (यत्) जो (सूर्यस्य) सूर्य्य के (पतन्तीः) चलती हुई (पुरः) पालनेवाली वा आगे से (सतीः) विद्यमान (उपराः) समीप में रमती हुई (हरितः) हरिद्वर्ण किरणों को (एतशे) घोड़े पर घोड़े के चढ़नेवाले के सदृश (कः) करता है, उसकी विद्या से (तुभ्यम्) आपके लिये जो (विश्वे) सम्पूर्ण (देवाः) विद्वान् जन (सोमपेयम्) सोम ओषधि के पान करने योग्य रस को (अनु, अददुः) अनुकूल देते हैं, वे (अध) इसके अनन्तर (क्रत्वा) बुद्धि से विशेष ज्ञानी होते हैं ॥५॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! सूर्य्यमण्डल में अनेक तत्त्वों के विद्यमान होने से अनेक रूप देख पढ़ते हैं, यह जानना चाहिये ॥५॥