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Rigveda / 5 / 29 / 9

उ॒शना॒ यत्स॑ह॒स्यै॒३॒॑रया॑तं गृ॒हमि॑न्द्र जूजुवा॒नेभि॒रश्वैः॑। व॒न्वा॒नो अत्र॑ स॒रथं॑ ययाथ॒ कुत्से॑न दे॒वैरव॑नोर्ह॒ शुष्ण॑म् ॥९॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 29 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : गौरिवीतिः शाक्त्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : उ॒शना॑। यत्। स॒ह॒स्यैः॑। अया॑तम्। गृ॒हम्। इ॒न्द्र॒। जू॒जु॒वा॒नेभिः॑। अश्वैः॑। व॒न्वा॒नः। अत्र॑। स॒ऽरथ॑म्। य॒या॒थ॒। कुत्से॑न। दे॒वैः। अव॑नोः। ह॒। शुष्ण॑म् ॥९॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) राजन् आप और (उशना) कामना करता हुआ जन ! तुम दोनों (सहस्यैः) बलों में उत्पन्न हुए पदार्थों के साथ (जूजुवानेभिः) वेगवाले (अश्वैः) घोड़ों वा अग्नि आदिकों से चलाये गये वाहन पर स्थित हो के (यत्) जिस (गृहम्) गृह को (अयातम्) प्राप्त हूजिये और (अत्र) इस जगत् में (ह) निश्चय से (वन्वानः) याचना करते हुए आप (कुत्सेन) वज्र के सदृश दृढ़ कर्म्म से (देवैः) विद्वानों से (शुष्णम्) बल की (अवनोः) रक्षा करिये और हे मनुष्यो ! आप लोग इन दोनों के साथ (सरथम्) रथ के साथ वर्त्तमान जैसे हो, वैसे निश्चय से (ययाथ) प्राप्त होओ ॥९॥

भावार्थ : जो राजा आदि मनुष्य उत्तम प्रकार श्रेष्ठ होवें, वे विमान आदि वाहनों को बना सकें और दुष्ट जनों के मारने को समर्थ होवें ॥९॥