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Rigveda / 1 / 33 / 2

उपेद॒हं ध॑न॒दामप्र॑तीतं॒ जुष्टां॒ न श्ये॒नो व॑स॒तिं प॑तामि । इन्द्रं॑ नम॒स्यन्नु॑प॒मेभि॑र॒र्कैर्यः स्तो॒तृभ्यो॒ हव्यो॒ अस्ति॒ याम॑न् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 33 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

पदपाठ : उप॑ । इत् । अ॒हम् । ध॒न॒ऽदाम् । अप्र॑तिऽइतम् । जुष्टा॑म् । न । श्ये॒नः । व॒स॒तिम् । प॒ता॒मि॒ । इन्द्र॑म् । न॒म॒स्यन् । उ॒प॒ऽमेभिः॑ । अ॒र्कैः । यः । स्तो॒तृऽभ्यः॑ । हव्यः॑ । अस्ति॑ । याम॑न्॥

पदार्थ : (यः) जो (हव्यः) ग्रहण करने योग्य ईश्वर (स्तोतृभ्यः) अपनी स्तुति करनेवालों के लिये धन देनेवाला (अस्ति) है उस (अप्रतीतम्) चक्षु आदि इन्द्रियों से अगोचर (धनदाम्) धन देनेवाले (इन्द्रम्) परमेश्वर को (नमस्यन्) नमस्कार करता हुआ (अहम्) मैं (न) जैसे (जुष्टाम्) पूर्व काल में सेवन किये हुए (वसतिम्) *घुसला को (श्येनः) वाज पक्षी प्राप्त होता है वैसे (यामन्) गमनशील अर्थात् चलायमान इस संसार में (उपमेभिः) उपमा देने के योग्य (अर्कैः) अनेक सूर्यों से (इत्) ही (उपपतामि) प्राप्त होता हूँ ॥२॥ *[घौंसले। सं०]

भावार्थ : इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे श्येन अर्थात् वेगवान् पक्षी अपने पहिले सेवन किये हुए सुख देनेवाले स्थान को स्थानान्तर से चलकर प्राप्त होता है वैसे ही परमेश्वर को नमस्कार करते हुए मनुष्य उसीके बनाये इस संसार में सूर्य आदि लोकों के दृष्टान्तों से ईश्वर का निश्चय करके उसीकी प्राप्ति करें क्योंकि जितने इस संसार में रचे हुए पदार्थ हैं वे सब रचनेवाले का निश्चय कराते हैं और रचनेवाले के विना किसी जड़ पदार्थ की रचना कभी नहीं हो सकती जैसे इस व्यवहार में रचनेवाले के विना कुछ भी पदार्थ नहीं बन सकता वैसे ही ईश्वर की सृष्टि में भी जानना चाहिये, बड़ा आश्चर्य है कि ऐसे निश्चय हो जाने पर भी जो ईश्वर का अनादर करके नास्तिक हो जाते हैं उनको यह बड़ा अज्ञान क्योंकर प्राप्त होता है ॥२॥