Rigveda / 5 / 30 / 2
अवा॑चचक्षं प॒दम॑स्य स॒स्वरु॒ग्रं नि॑धा॒तुरन्वा॑यमि॒च्छन्। अपृ॑च्छम॒न्याँ उ॒त ते म॑ आहु॒रिन्द्रं॒ नरो॑ बुबुधा॒ना अ॑शेम ॥२॥
Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 30 | Mantra No : 2
In English:
Seer : gauriviitiH shaaktyaH | Devta : indra: | Metre : viraaTtriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : avaachachakSha.m padamasya sasvarugra.m nidhaaturanvaayamichChan. apRRichChamanyaa.N uta te ma aahurindra.m naro bubudhaanaa ashema .2.
Component Words : ava. achachakSham. padam. asya. sasvaH. ugram. ni.adhaatuH. anu. aayam. ichChan. apRRichCham. anyaan. uta. te. me. aahuH. indram. naraH. bubudhaanaaH. ashema .2.
In Hindi:
ऋषि : गौरिवीतिः शाक्त्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : अव॑। अ॒च॒च॒क्ष॒म्। प॒दम्। अ॒स्य॒। स॒स्वः। उ॒ग्रम्। नि॒ऽधा॒तुः। अनु॑। आ॒य॒म्। इ॒च्छन्। अपृ॑च्छम्। अ॒न्यान्। उ॒त। ते। मे॒। आ॒हुः॒। इन्द्र॑म्। नरः॑। बु॒बु॒धा॒नाः। अ॒शे॒म॒ ॥२॥
पदार्थ : शिल्पविद्या की (इच्छन्) इच्छा करता हुआ मैं जिन (अन्यान्) अन्य विद्वानों को (अपृच्छम्) पूछूँ (ते) वे (बुबुधानाः) सम्बोधयुक्त (नरः) नायक जन विद्वान् (मे) मेरे लिये (इन्द्रम्) बिजुली को (आहुः) कहें, उसको (अस्य) इस शिल्पविद्या के (निधातुः) धारण करनेवाले के (सस्वः) गुप्त (उग्रम्) उग्र गुण, कर्म्म और स्वभाववाले (पदम्) प्राप्त होने योग्य विज्ञान को (अनु, आयम्) अनुकूल प्राप्त होऊँ और अन्यों के प्रति (अव, अचचक्षम्) निश्शेष कहूँ, इस प्रकार (उत) भी मित्र के सदृश वर्त्तमान हम लोग अङ्ग और उपाङ्गों के सहित शिल्पविद्याओं को (अशेम) प्राप्त होवें ॥२॥
भावार्थ : जब शिल्प आदि के जानने की इच्छा करनेवाले जन विद्वानों के प्रति पूछें, तब उनके प्रति यथार्थ उत्तर देवें, इस प्रकार परस्पर मित्र हुए बिजुली आदि की विद्या की उन्नति करें ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : गौरिवीतिः शाक्त्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ॥
पदपाठ : अव॑। अ॒च॒च॒क्ष॒म्। प॒दम्। अ॒स्य॒। स॒स्वः। उ॒ग्रम्। नि॒ऽधा॒तुः। अनु॑। आ॒य॒म्। इ॒च्छन्। अपृ॑च्छम्। अ॒न्यान्। उ॒त। ते। मे॒। आ॒हुः॒। इन्द्र॑म्। नरः॑। बु॒बु॒धा॒नाः। अ॒शे॒म॒ ॥२॥
पदार्थ : (अव) (अचचक्षम्) कथयेयम् (पदम्) प्रापणीयं विज्ञानम् (अस्य) शिल्पस्य (सस्वः) गुप्तम् (उग्रम्) उग्रगुणकर्मस्वभावम् (निधातुः) धरतुः (अनु) (आयम्) प्राप्नुयाम् (इच्छन्) (अपृच्छम्) पृच्छेयम् (अन्यान्) विदुषः (उत) (ते) विद्वांसः (मे) मह्यम् (आहुः) कथयन्तु (इन्द्रम्) विद्युतम् (नरः) नायकाः (बुबुधानाः) सम्बोधयुक्ताः (अशेम) प्राप्नुयाम ॥२॥
अन्वय : शिल्पविद्यामिच्छन्नहं यावन्यान् विदुषोऽपृच्छं ते बुबुधाना नरो म इन्द्रमाहुस्तमस्य निधातुः सस्वरुग्रं पदमन्वायमन्यान् प्रत्यवाचचक्षमेवमुत मित्रवद्वर्त्तमाना वयं साङ्गोपाङ्गाः शिल्पविद्या अशेम ॥२॥
भावार्थ : यदा जिज्ञासवो विदुषः प्रति पृच्छेयुस्तदा तान् प्रति यथार्थमुत्तरं प्रदद्युरेवं सखायः सन्तो विद्युदादिविद्यामुन्नयेयुः ॥२॥