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Rigveda / 5 / 30 / 12

भ॒द्रमि॒दं रु॒शमा॑ अग्ने अक्र॒न्गवां॑ च॒त्वारि॒ दद॑तः स॒हस्रा॑। ऋ॒णं॒च॒यस्य॒ प्रय॑ता म॒घानि॒ प्रत्य॑ग्रभीष्म॒ नृत॑मस्य नृ॒णाम् ॥१२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 30 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : बभ्रु रात्रेयः | देवता : इन्द्र ऋणञ्चयश्च | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब अग्निदृष्टान्त से राजविषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : भ॒द्रम्। इ॒दम्। रु॒शमाः॑। अ॒ग्ने॒। अ॒क्र॒न्। गवा॑म्। च॒त्वारि॑। दद॑तः। स॒हस्रा॑। ऋ॒ण॒म्ऽच॒यस्य॑। प्रऽय॑ता। म॒घानि॑। प्रति॑। अ॒ग्र॒भी॒॒ष्म॒। नृऽत॑मस्य। नृ॒णाम् ॥१२॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी राजन् ! जिस (ऋणञ्चयस्य) अर्थात् जिससे ऋण बटोरता है उसके और (गवाम्) किरणों के (चत्वारि) चार (सहस्रा) हजार को (ददतः) देते हुए सूर्य के (इदम्) इस (भद्रम्) कल्याण को (रुशमाः) हिंसा करनेवालों के फेंकनेवाले (अक्रन्) करते हैं, उसके सदृश वर्त्तमान उस (नृणाम्) मनुष्यों के (नृतमस्य) नृतम् अर्थात् अत्यन्त मनुष्यपनयुक्त श्रेष्ठ आपके (मघानि) धनों को हम लोग (प्रयता) प्रयत्न से (प्रति, अग्रभीष्म) प्रतीति से ग्रहण करें ॥१२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य सहस्रों किरणों को देकर सम्पूर्ण जगत् को आनन्दित करता है, वैसे ही राजा असंख्य उत्तम गुणों को देकर प्रजाओं को निरन्तर प्रसन्न करे ॥१२॥