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Rigveda / 5 / 34 / 2

आ यः सोमे॑न ज॒ठर॒मपि॑प्र॒ताम॑न्दत म॒घवा॒ मध्वो॒ अन्ध॑सः। यदीं॑ मृ॒गाय॒ हन्त॑वे म॒हाव॑धः स॒हस्र॑भृष्टिमु॒शना॑ व॒धं यम॑त् ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 34 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : संवरणः प्राजापत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब विद्वद्विषय में पाक के गुणों को कहते हैं ॥

पदपाठ : आ। यः। सोमे॑न। ज॒ठर॑म्। अपि॑प्रत। अम॑न्दत। म॒घऽवा॑। मध्वः॑। अन्ध॑सः। यत्। ई॒म्। मृ॒गाय॑। हन्त॑वे। म॒हाऽव॑धः। स॒हस्र॑ऽभृष्टिम्। उश॒ना॑। व॒धम्। यम॑त् ॥२॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यः) जो (उशना) कामना करता हुआ (मघवा) बहुत धन से युक्त (सोमेन) सोमलता से उत्पन्न रस से (जठरम्) उदर की अग्नि को (आ, अपिप्रत) अच्छे प्रकार पूर्ण करे और (मध्वः) मधुर आदि गुणों से युक्त (अन्धसः) अन्न आदि का भोग करके (अमन्दत) आनन्द करे और (यत्) जो (महावधः) अत्यन्त नाश करनेवाला (मृगाय) हरिण को (हन्तवे) मारने के लिये (सहस्रभृष्टिम्) हजारों दहन जिससे उस (वधम्) वध को (ईम्) सब प्रकार से (यमत्) देवे, वह सब सुख को प्राप्त होता है ॥२॥

भावार्थ : जो मनुष्य वैद्यकशास्त्र की रीति से सोमलता आदि ओषधियों के रस के साथ संस्कारयुक्त किये गये अन्नों का भोग करते हैं, वे अतुल सुख को प्राप्त होते हैं ॥२॥