Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 34 / 4

यस्याव॑धीत्पि॒तरं॒ यस्य॑ मा॒तरं॒ यस्य॑ श॒क्रो भ्रात॑रं॒ नात॑ ईषते। वेतीद्व॑स्य॒ प्रय॑ता यतंक॒रो न किल्बि॑षादीषते॒ वस्व॑ आक॒रः ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 34 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : संवरणः प्राजापत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : अब प्रजाविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : यस्य॑। अव॑धीत्। पि॒तर॑म्। यस्य॑। मा॒तर॑म्। यस्य॑। श॒क्रः। भ्रात॑रम्। न। अतः॑। ई॒ष॒ते॒। वेति॑। इत्। ऊँ॒ इति॑। अस्य। प्रऽय॑ता। य॒त॒म्ऽक॒रः। न। किल्वि॑षात्। ई॒ष॒ते॒। वस्वः॑। आ॒ऽक॒रः ॥४॥

पदार्थ : (शक्रः) सामर्थ्यवान् जन (यस्य) जिसके (पितरम्) पिता का (यस्य) जिसकी (मातरम्) माता का और (यस्य) जिसके (भ्रातरम्) भ्राता का (न) नहीं (अवधीत्) नाश करे (अतः) इससे इसका (न) नहीं (ईषते) नाश करता और (अस्य) इसके (यतङ्करः) प्रयत्न करनेवाले के (न) सदृश (प्रयता) अत्यन्त दिये हुओं की (वेति) कामना करता है (उ) और (वस्वः) धन का (आकरः) समूह (किल्विषात्) पाप से पृथक् (इत्) ही (ईषते) प्राप्त होता है ॥४॥

भावार्थ : जो पिता, माता और भ्रातृ आदि पालन करें, उनके पुत्र आदि को चाहिये कि निरन्तर सत्कार करें और जो पापाचरण का त्याग करके धर्म्म का आचरण करते हैं, वे सब काल में सुखी होते हैं ॥४॥