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Rigveda / 5 / 38 / 3

शुष्मा॑सो॒ ये ते॑ अद्रिवो मे॒हना॑ केत॒सापः॑। उ॒भा दे॒वाव॒भिष्ट॑ये दि॒वश्च॒ ग्मश्च॑ राजथः ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 38 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अब राजप्रजाधर्मविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : शुष्मा॑सः। ये। ते॒। अ॒द्रि॒ऽवः॒। मे॒हना॑। के॒त॒ऽसापः॑ उ॒भा। दे॒वौ। अ॒भिष्ट॑ये। दि॒वः। च॒। ग्मः। च॒। रा॒ज॒थः॒ ॥३॥

पदार्थ : हे (अद्रिवः) मेघों के सदृश पर्वत हैं जिसके राज्य में ऐसे राजन् ! जैसे (उभा) दोनों सूर्य और चन्द्रमा (देवौ) उत्तम गुण, कर्म्म और स्वभाववाले (दिवः) अन्तरिक्ष (च) और (ग्मः) पृथिवी के (च) भी मध्य में प्रकाशित हैं, वैसे (ये) जो (शुष्मासः) अधिक बलयुक्त (केतसापः) बुद्धि से सम्बन्ध रखनेवाले जन (ते) वे (अभिष्टये) इष्टसिद्धि के लिये (मेहना) वर्षण से प्रजाओं में हैं, वह प्रजा और आप निरन्तर (राजथः) प्रकाशित होते हैं ॥३॥

भावार्थ : जैसे सूर्य्य और चन्द्रमा सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करते हैं, वैसे ही प्रजा और राजा मिल के सम्पूर्ण राजधर्म्म को प्रकाशित करें ॥३॥