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Rigveda / 5 / 38 / 5

नू त॑ आ॒भिर॒भिष्टि॑भि॒स्तव॒ शर्म॑ञ्छतक्रतो। इन्द्र॒ स्याम॑ सुगो॒पाः शूर॒ स्याम॑ सुगो॒पाः ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 38 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : नु। ते॒। आ॒भिः। अ॒भिष्टि॑ऽभिः। तव॑। शर्म॑न्। श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो। इन्द्र॑। स्याम॑। सु॒ऽगो॒पाः। शूर॑। स्याम॑। सु॒ऽगो॒पाः ॥५॥

पदार्थ : हे (शतक्रतो) अत्यन्त बुद्धिवाले (इन्द्र) राजन् ! (ते) आपकी (आभिः) इन वर्त्तमान (अभिष्टिभिः) इष्ट पदार्थों की इच्छाओं से (तव) आपके (शर्मन्) गृह में हम लोग (सुगोपाः) उत्तम प्रकार रक्षा करनेवाले (स्याम) होवें। और हे (शूर) भय से रहित राजन् ! आपके राज्य वा संग्राम में हम लोग (सुगोपाः) यथावत् प्रजा के पालन करनेवाले (नू) निश्चय (स्याम) होवें ॥५॥

भावार्थ : हे राजन् ! हम लोग सत्य प्रतिज्ञा और प्रीति से आपके गृह, शरीर, राज्य और सेना के सदा ही रक्षक होके कृतकृत्य होवें ॥५॥ इस सूक्त में इन्द्र विद्वान् राजा और प्रजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह अड़तीसवाँ सूक्त और नववाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥