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Rigveda / 5 / 40 / 3

वृषा॑ त्वा॒ वृष॑णं हुवे॒ वज्रि॑ञ्चि॒त्राभि॑रू॒तिभिः॑। वृष॑न्निन्द्र॒ वृष॑भिर्वृत्रहन्तम ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 40 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर इन्द्रपदवाच्य राजा के गुणों को कहते हैं ॥

पदपाठ : वृषा॑। त्वा॒। वृष॑णम्। हु॒वे॒। वज्रि॑न्। चि॒त्राभिः॑। ऊ॒तिऽभिः॑। वृष॑न्। इ॒न्द्र॒। वृष॑ऽभिः। वृ॒त्र॒ह॒न्ऽत॒म॒ ॥३॥

पदार्थ : हे (वृषन्) सुख करनेवाले (वज्रिन्) बहुत शस्त्र और अस्त्रों से युक्त (वृत्रहन्तम) अत्यन्त दुष्टों के नाश करनेवाले (इन्द्र) ऐश्वर्य्य की इच्छा करनेवाले ! (वृषा) वृष्टि करनेवाला मैं (चित्राभिः) अद्भुत (ऊतिभिः) रक्षादि क्रियाओं और (वृषभिः) दुष्टों के सामर्थ्य को बाँधनेवालों के साथ वर्त्तमान (वृषणम्) बलिष्ठ (त्वा) आप को (हुवे) बुलाता हूँ ॥३॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि सूर्य्य के सदृश वर्त्तमान और सब प्रकार गुणों से सम्पन्न बलिष्ठ, न्यायकारी राजा को स्वीकार करें, जिससे सब प्रकार से रक्षा होवे ॥३॥