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Rigveda / 5 / 40 / 5

यत्त्वा॑ सूर्य॒ स्व॑र्भानु॒स्तम॒सावि॑ध्यदासु॒रः। अक्षे॑त्रवि॒द्यथा॑ मु॒ग्धो भुव॑नान्यदीधयुः ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 40 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : अब सूर्य्यविषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : यत्। त्वा॒। सू॒र्य॒। स्वः॑ऽभानुः। तम॑सा। अवि॑ध्यत्। आ॒सु॒रः। अक्षेत्र॑ऽवित्। यथा॑। मु॒ग्धः। भुव॑नानि। अ॒दी॒ध॒युः॒ ॥५॥

पदार्थ : हे (सूर्य्य) सूर्य्य के सदृश वर्तमान ! (यथा) जैसे (अक्षेत्रवित्) क्षेत्र अर्थात् रेखागणित को नहीं जाननेवाला (मुग्धः) मूर्ख कुछ भी नहीं कर सकता है, वैसे (यत्) जो (स्वर्भानुः) सूर्य्य से प्रकाशित होनेवाला बिजुलीरूप (आसुरः) जिसका प्रकट रूप नहीं वह (तमसा) रात्रि के अन्धकार से (अविध्यत्) युक्त होता है, जिस सूर्य्य से (भुवनानि) लोक (अदीधयुः) देखे जाते हैं, उसके जाननेवाले (त्वा) आपका हम लोग आश्रयण करें ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जैसे बिजुली गुप्त हुई अन्धकार में नहीं प्रकाशित होती है, वैसे ही विद्यारहित मूर्खजन का आत्मा नहीं प्रकाशित होता है और जैसे सूर्य्य के प्रकाश से सम्पूर्ण लोक प्रकाशित होते हैं, वैसे ही विद्वान् का आत्मा सम्पूर्ण सत्य और असत्य व्यवहारों को प्रकाशित करता है ॥५॥