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Rigveda / 5 / 41 / 6

प्र वो॑ वा॒युं र॑थ॒युजं॑ कृणुध्वं॒ प्र दे॒वं विप्रं॑ पनि॒तार॑म॒र्कैः। इ॒षु॒ध्यव॑ ऋत॒सापः॒ पुरं॑धी॒र्वस्वी॑र्नो॒ अत्र॒ पत्नी॒रा धि॒ये धुः॑ ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 41 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : प्र। वः॒। वा॒युम्। र॒थ॒ऽयुजम्॑। कृ॒णु॒ध्व॒म्। प्र। दे॒वम्। विप्रम्॑। प॒नि॒तार॑म्। अ॒र्कैः। इ॒षु॒ध्यवः॑ ऋ॒त॒ऽसापः॑। पुर॑म्ऽधीः। वस्वीः॑। नः॒। अत्र॑। पत्नीः॑। आ। धि॒ये। धु॒रिति॑ धुः ॥६॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (अत्र) इस संसार में (इषुध्यवः) बाणों के द्वारा युद्ध करने वा (ऋतसापः) सत्य सम्बन्ध रखनेवाले विद्वान् जन (वः) आप लोगों के लिये (रथयुजम्) वाहन से युक्त (वायुम्) वेगवाले वायु को (धुः) धारण करें वा आप लोगों और (नः) हम लोगों के लिये (पत्नीः) स्त्रियों के सदृश वर्त्तमानों को और (धिये) बुद्धि के लिये (वस्वीः) बहुत पदार्थों से युक्त (पुरन्धीः) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (आ) सब प्रकार धारण करें उनके संग से वेगयुक्त वाहन से युक्त को (प्र, कृणुध्वम्) अच्छे प्रकार सिद्ध करें (अर्कैः) प्रशंसनीय पदार्थों से (पनितारम्) स्तुति करने और धर्म्म से व्यवहार करनेवाले (विप्रम्) बुद्धिमान् (देवम्) विद्वान् को (प्र) अच्छे प्रकार प्रकट करो ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जैसे पतिव्रता पत्नी पति आदि को सुख देती हैं, वैसे ही वायु के समान वेगयुक्त रथ को और धार्मिक विद्वानों को धारण कर सब को सुखयुक्त करो ॥६॥