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Rigveda / 5 / 41 / 9

तु॒जे न॒स्तने॒ पर्व॑ताः सन्तु॒ स्वैत॑वो॒ ये वस॑वो॒ न वी॒राः। प॒नि॒त आ॒प्त्यो य॑ज॒तः सदा॑ नो॒ वर्धा॑न्नः॒ शंसं॒ नर्यो॑ अ॒भिष्टौ॑ ॥९॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 41 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : तु॒जे। नः॒। तने॑। पर्व॑ताः। स॒न्तु॒। स्वऽए॑तवः। ये। वस॑वः। न। वी॒राः। प॒नि॒तः। आ॒प्त्यः। य॒ज॒तः। सदा॑। नः॒। वर्धा॑त्। नः॒। शंस॑म्। नर्यः॑। अ॒भिष्टौ॑ ॥९॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (ये) जो (स्वैतवः) उत्तम गमनवाले (वसवः) पृथिवी आदि (वीराः) बुद्धि और शरीर के बल से युक्त जनों के (न) सदृश (तने) विस्तीर्ण (तुजे) दान में (वः) हम लोगों के लिये (पर्वताः) जल के देनेवाले मेघ और दाता जनों के सदृश (सन्तु) होवें और जो (अभिष्टौ) इष्ट की सिद्धि में (पनितः) प्रशंसित (आप्त्यः) यथार्थवक्ता जनों में उत्पन्न (यजतः) मिलने वा सत्कार करने योग्य जन (नः) हम लोगों की (सदा) सदा (वर्धात्) वृद्धि करे और जो (नर्य्यः) मनुष्यों में श्रेष्ठ (नः) हम लोगों को (शंसम्) प्रशंसा को प्राप्त करावें, उन सब का हम लोग सत्कार करें ॥९॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो जन वीरजनों के सदृश शत्रुओं के निवारण करने, मेघ के सदृश देनेवाले और वायु के सदृश वेगयुक्त विद्वान् हम लोगों की नित्य वृद्धि करें, उनकी हम लोग भी वृद्धि करें ॥९॥