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Rigveda / 5 / 41 / 15

प॒देप॑दे मे जरि॒मा नि धा॑यि॒ वरू॑त्री वा श॒क्रा या पा॒युभि॑श्च। सिष॑क्तु मा॒ता म॒ही र॒सा नः॒ स्मत्सू॒रिभि॑र्ऋजु॒हस्त॑ ऋजु॒वनिः॑ ॥१५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 41 | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : प॒देऽपदे॑। मे॒। ज॒रि॒मा। नि। धा॒यि॒। वरू॑त्री। वा॒। श॒क्रा। या। पा॒युऽभिः॑। च॒। सिस॑क्तु। मा॒ता। म॒ही। र॒सा। नः॒। स्मत्। सू॒रिऽभिः॑। ऋ॒जु॒ऽहस्ता॑। ऋ॒जु॒ऽवनिः॑ ॥१५॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (सूरिभिः) विद्वानों और (पायुभिः) रक्षकों से (च) और (या) जो (मे) मेरे (पदेपदे) प्राप्त होने प्राप्त होने, जानने जानने वा जाने जाने योग्य पदार्थ में (वरूत्री) श्रेष्ठ सुख की देने (जरिमा) और स्तुति करानेवाली (वा) वा (शक्रा) सामर्थ्य में कारण (माता) माता (रस) रस आदि गुणों से युक्त (मही) बड़ी वाणी वा भूमि (ऋजुहस्ता) ऋजु अर्थात् सरल हस्त जिसके वा जिसमें वह (ऋजुवनिः) ऋजु अर्थात् नहीं जो कुटिल उन पदार्थों के विभक्त करनेवाली (नः) हम लोगों को (सिषक्तु) सम्बन्धित करे वह (स्मत्) ही (नि) निरन्तर (धायि) स्थित की जाती है ॥१५॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे माता सन्तानों की रक्षा करती है, वैसे ही विद्वानों के संग से प्राप्त और उत्तम प्रकार शिक्षित विद्या विद्वानों की सब प्रकार रक्षा करती है ॥१५॥