Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 44 / 10

सहि क्ष॒त्रस्य॑ मन॒सस्य॒ चित्ति॑भिरेवाव॒दस्य॑ यज॒तस्य॒ सध्रेः॑। अ॒व॒त्सा॒रस्य॑ स्पृणवाम॒ रण्व॑भिः॒ शवि॑ष्ठं॒ वाजं॑ वि॒दुषा॑ चि॒दर्ध्य॑म् ॥१०॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 44 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : अवत्सारः काश्यप अन्ये च दृष्टलिङ्गाः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : सः। हि। क्ष॒त्रस्य॑। म॒न॒सस्य॑। चित्ति॑ऽभिः। ए॒व॒ऽव॒दस्य॑। य॒ज॒तस्य॑। सध्रेः॑। अ॒व॒ऽत्सा॒रस्य॑। स्पृ॒ण॒वा॒म॒। रण्व॑ऽभिः। शवि॑ष्ठम्। वाज॑म्। वि॒दुषा॑। चि॒त्। अर्ध्य॑म् ॥१०॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (चित्तिभिः) इकट्ठे करनेरूप क्रियाओं से जिस (एवावदस्य) एवावद अर्थात् प्राप्त गुणों को कहते हैं जिससे वा (यजतस्य) मिलते हैं जिससे वा जो (अवत्सारस्य) रक्षकों को प्राप्त होते और (मनसस्य) माना जाता और उस (सध्रेः) तुल्य स्थानवाले (क्षत्रस्य) राजकुल वा राज्य के सम्बन्ध की (स्पृणवाम) इच्छा करें तथा (विदुषा) विद्वान् से (चित्) भी (अर्ध्यम्) अर्द्ध में उत्पन्न की तथा (रण्वभिः) रमणीयों से (शविष्ठम्) अत्यन्त बलिष्ठ (वाजम्) विज्ञानवान् की हम इच्छा करें (स, हि) वही हम लोगों की इच्छा करे ॥१०॥

भावार्थ : जो मनुष्य दिन-रात्रि राज्य की उन्नति करने की इच्छा करते हैं, वे महाराज होते हैं ॥१०॥