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Rigveda / 5 / 46 / 3

इ॒न्द्रा॒ग्नी मि॒त्रावरु॒णादि॑तिं॒ स्वः॑ पृथि॒वीं द्यां म॒रुतः॒ पर्व॑ताँ अ॒पः। हु॒वे विष्णुं॑ पू॒षणं॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिं॒ भ॒गं नु शंसं॑ सवि॒तार॑मू॒तये॑ ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 46 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : प्रतिक्षत्र आत्रेयः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : भुरिग्जगती | स्वर : निषादः

विषय : इस सृष्टि में मनुष्यों को क्या क्या जानना योग्य है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : इ॒न्द्रा॒ग्नी इति॑। मि॒त्रावरु॑णा। अदि॑तिम्। स्व॑रि॒ति॑ स्वः॑। पृ॒थि॒वीम्। द्याम्। म॒रुतः॑। पर्व॑तान्। अ॒पः। हु॒वे। विष्णु॑म्। पू॒षण॑म्। ब्रह्म॑णः। पति॑म्। भग॑म्। नु। शंस॑म्। स॒वि॒ता॑रम्। ऊ॒तये॑ ॥३॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे मैं (ऊतये) रक्षा आदि व्यवहार की सिद्धि के लिये (इन्द्राग्नी) सूर्य्य और बिजुली (मित्रावरुणा) प्राण और उदान वायु तथा (अदितिम्) अन्तरिक्ष को (स्वः) सूर्य्य और (पृथिवीम्) भूमि को (द्याम्) प्रकाश को (मरुतः) पवनों वा मनुष्यों को (पर्वतान्) मेघों वा पर्वतों को (अपः) जलों को (विष्णुम्) व्यापक धन वा जय को (पूषणम्) पुष्टिकारक व्यान वायु और (ब्रह्मणः) ब्रह्माण्ड के (पतिम्) पालन करनेवाले सूत्रात्मा को (भगम्) ऐश्वर्य और (शंसम्) प्रशंसा करने योग्य (सवितारम्) संसार के उत्पन्न करनेवाले परमात्मा को (हुवे) ग्रहण करता हूँ, वैसे आप लोग (नु) शीघ्र इनको ग्रहण करना चाहिये ॥३॥

भावार्थ : मनुष्यों को विद्युद्विद्या अवश्य स्वीकार करनी चाहिये ॥३॥