Rigveda / 5 / 46 / 7
दे॒वानां॒ पत्नी॑रुश॒तीर॑वन्तु नः॒ प्राव॑न्तु नस्तु॒जये॒ वाज॑सातये। याः पार्थि॑वासो॒ या अ॒पामपि॑ व्र॒ते ता नो॑ देवीः सुहवाः॒ शर्म॑ यच्छत ॥७॥
Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 46 | Mantra No : 7
In English:
Seer : pratikShatra aatreyaH | Devta : vishvedevaa: | Metre : nichRRijjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : devaanaa.m patniirushatiiravantu naH praavantu nastujaye vaajasaataye. yaaH paarthivaaso yaa apaamapi vrate taa no deviiH suhavaaH sharma yachChata .7.
Component Words : devaanaam. patniiH. ushatiiH. avantu. naH. pra. avantu. naH. tujaye. vaaja.asaataye. yaaH. paarthivaasaH. yaaH. apaam. api. vrate. taaH. naH. deviiH. su.ahavaaH. sharma. yachChata .7.
In Hindi:
ऋषि : प्रतिक्षत्र आत्रेयः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय : राजा के समान राजपत्नी न्याय करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : दे॒वाना॑म्। पत्नीः॑। उ॒श॒तीः। अ॒व॒न्तु॒। नः॒। प्र। अ॒व॒न्तु॒। नः॒। तु॒जये॑। वाज॑ऽसातये। याः। पार्थि॑वासः। याः। अ॒पाम्। अपि॑। व्र॒ते। ताः। नः॒। दे॒वीः॒। सु॒ऽह॒वाः॒। शर्म॑। य॒च्छ॒त॒ ॥७॥
पदार्थ : हे मनुष्यो ! (याः) जो (देवानाम्) विद्वानों वा राजाओं के न्याय की (उशतीः) कामना करती हुई (पत्नीः) स्त्रियाँ (नः) हम लोगों की वा हमारे सम्बन्धी पदार्थों की (अवन्तु) रक्षा करें और (तुजये) बल और (वाजसातये) संग्राम के लिये (प्र, अवन्तु) अच्छे प्रकार रक्षा करें और (याः) जो (पार्थिवासः) पृथिवी में विदित (अपाम्) जलों के (व्रते) स्वभाव में (अपि) भी (देवीः) प्रकाशमान (सुहवाः) उत्तम आह्वानवाली (नः) हम लोगों को (शर्म) सुखकारक गृह देवें और (ताः) उनको (नः) हम लोगों के लिये आप लोग (यच्छत) दीजिये ॥७॥
भावार्थ : जैसे राजा लोग पुरुषों का न्याय करें, वैसे ही स्त्रियों के न्याय को रानियाँ करें ॥७॥
In Sanskrit:
ऋषि : प्रतिक्षत्र आत्रेयः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय : राजवद्राज्ञः स्त्री न्यायं करोत्वित्याह ॥
पदपाठ : दे॒वाना॑म्। पत्नीः॑। उ॒श॒तीः। अ॒व॒न्तु॒। नः॒। प्र। अ॒व॒न्तु॒। नः॒। तु॒जये॑। वाज॑ऽसातये। याः। पार्थि॑वासः। याः। अ॒पाम्। अपि॑। व्र॒ते। ताः। नः॒। दे॒वीः॒। सु॒ऽह॒वाः॒। शर्म॑। य॒च्छ॒त॒ ॥७॥
पदार्थ : (देवानाम्) विदुषाम् (पत्नीः) स्त्रियः (उशतीः) कामयमानाः (अवन्तु) रक्षन्तु (नः) अस्मानस्माकं वा (प्र, अवन्तु) (नः) अस्मान् (तुजये) बलाय (वाजसातये) (याः) (पार्थिवासः) पृथिव्यां विदिताः (याः) अपां जलानाम् (अपि) (व्रते) शीले (ताः) (नः) अस्मभ्यम् (देवीः) देदीप्यमानाः (सुहवाः) शोभनाह्वानाः (शर्म) सुखकारकं गृहम् (यच्छत) ददत ॥७॥
अन्वय : हे मनुष्या ! या देवानां राज्ञां न्यायमुशतीः पत्नीर्नोऽवन्तु तुजये वाजसातये प्रावन्तु याः पार्थिवासोऽपां व्रतेऽपि देवीः सुहवा नः शर्म प्रदद्युस्ता नो यूयं यच्छत ॥७॥
भावार्थ : यथा राजानः पुरुषाणां न्यायं कुर्युस्तथैव स्त्रीणां न्यायं राज्ञ्यः कुर्य्युः ॥७॥