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Rigveda / 5 / 47 / 5

इ॒दं वपु॑र्नि॒वच॑नं जनास॒श्चर॑न्ति॒ यन्न॒द्य॑स्त॒स्थुरापः॑। द्वे यदीं॑ बिभृ॒तो मा॒तुर॒न्ये इ॒हेह॑ जा॒ते य॒म्या॒३॒॑ सब॑न्धू ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 47 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : प्रतिरथ आत्रेयः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्यों को क्या जानना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : इ॒दम्। वपुः॑। नि॒ऽवच॑नम्। ज॒ना॒सः॒। चर॑न्ति। यत्। न॒द्यः॑। त॒स्थुः। आपः॑। द्वे॒ इति॑। यत्। ई॒म्। बि॒भृ॒तः। मा॒तुः। अ॒न्ये॒ इति॑। इ॒हऽइ॑ह। जा॒ते इति॑। य॒म्या॑। सब॑न्धू इति॑ सऽब॑न्धू॒ ॥५॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे (इहेह) इसी संसार में (द्वे) दो (यम्या) रात्रि और दिन (सबन्धू) तुल्य बन्धु जिनका उनके सदृश वर्त्तमान और (मातुः) माता से (अन्ये) अन्य (जाते) उत्पन्न हुए (ईम्) जल को (बिभृतः) धारण करते हैं और (यत्) जो संसार का उपकार करते हैं और (यत्) जो (जनासः) विद्वान् जन जैसे (नद्यः) नदियाँ (आपः) जलों को वैसे (इदम्) इस (निवचनम्) निश्चित वचन जिसका उस (वपुः) शरीर को (चरन्ति) प्राप्त होते और (तस्थुः) स्थित होते हैं, वैसे इनको विशेष कर जानिये ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । मनुष्यों को चाहिये कि जैसे रात्रि-दिन क्रम से व्यवहार करते हैं, वैसे क्रम से आहार-विहार करके शरीर की रक्षा करनी चाहिये ॥५॥