Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 50 / 5

ए॒ष ते॑ देव नेता॒ रथ॒स्पतिः॒ शं र॒यिः। शं रा॒ये शं स्व॒स्तय॑ इषः॒स्तुतो॑ मनामहे देव॒स्तुतो॑ मनामहे ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 50 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : स्वस्त्यात्रेयः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : भुरिगुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : मनुष्यों को क्या माँगना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : ए॒षः। ते॒। दे॒व॒। ने॒त॒रिति॑। रथः॒पतिः॑। शम्। र॒यिः। शम्। रा॒ये। शम्। स्व॒स्तये॑। इ॒षः॒ऽस्तुतः॑। म॒ना॒म॒हे॒। दे॒व॒ऽस्तुतः॑। म॒ना॒म॒हे॒ ॥५॥

पदार्थ : हे (नेतः) प्राप्ति करानेवाले (देव) विद्वन् ! (ते) आपका (एषः) यह (रथस्पतिः) वाहन का स्वामी (शम्) सुखरूप (रयिः) धन और (शम्) सुख (राये) धन के लिये वा (स्वस्तये) सुख के लिये (शम्) कल्याण (इषःस्तुतः) अन्न आदि की स्तुति करनेवाला और जो (देवस्तुतः) विद्वानों से प्रशंसित है, उनकी हम लोग (मनामहे) याचना करते हैं और हम लोग (मनामहे) जानते हैं ॥५॥

भावार्थ : जो विद्वानों में प्रशंसित और कल्याणकारक पदार्थ होवें उनको हम लोग ग्रहण करें ॥५॥ इस सूक्त में विद्वानों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह पचासवाँ सूक्त और चतुर्थ वर्ग समाप्त हुआ ॥