Rigveda / 5 / 51 / 5
वाय॒वा या॑हि वी॒तये॑ जुषा॒णो ह॒व्यदा॑तये। पिबा॑ सु॒तस्यान्ध॑सो अ॒भि प्रयः॑ ॥५॥
Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 51 | Mantra No : 5
In English:
Seer : svastyaatreyaH | Devta : vishvedevaa: | Metre : nichRRidgaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : vaayavaa yaahi viitaye juShaaNo havyadaataye. pibaa sutasyaandhaso abhi prayaH .5.
Component Words : vaayo iti. aa. yaahi. viitaye. juShaaNaH. havya.adaataye. piba. sutasya. andhasaH. abhi. prayaH .5.
In Hindi:
ऋषि : स्वस्त्यात्रेयः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : मनुष्यों को क्या भोजन करना और क्या पीना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : वायो॒ इति॑। आ। या॒हि॒। वी॒तये॑। जु॒षा॒णः। ह॒व्यऽदा॑तये। पिब॑। सु॒तस्य॑। अन्ध॑सः। अ॒भि। प्रयः॑ ॥५॥
पदार्थ : हे (वायो) अत्यन्त बल से युक्त ! आप (हव्यदातये) देने योग्य वस्तु के देने के लिये और (वीतये) विज्ञान आदि की प्राप्ति के लिये (अभि, प्रयः) सब ओर से सुन्दर जल का (जुषाणः) सेवन करते हुए (आ, याहि) प्राप्त हूजिये और (सुतस्य) उत्पन्न हुए (अन्धसः) अन्न के रस का (पिबा) पान करिये ॥५॥
भावार्थ : हे विद्वन् ! आप रोग और प्रमाद के नाश करने और बुद्धि के बढ़ानेवाले अन्न को खाइये और रस को पीजिये ॥५॥
In Sanskrit:
ऋषि : स्वस्त्यात्रेयः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : मनुष्यैः किं भोक्तव्यं पेयं चेत्युपदिश्यते ॥
पदपाठ : वायो॒ इति॑। आ। या॒हि॒। वी॒तये॑। जु॒षा॒णः। ह॒व्यऽदा॑तये। पिब॑। सु॒तस्य॑। अन्ध॑सः। अ॒भि। प्रयः॑ ॥५॥
पदार्थ : (वायो) परमबलयुक्त (आ) (याहि) आगच्छ (वीतये) विज्ञानादिप्राप्तये (जुषाणः) सेवमानः (हव्यदातये) दातव्यदानाय (पिबा) अत्र द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (सुतस्य) निष्पन्नस्य (अन्धसः) अन्नस्य रसान् (अभि) (प्रयः) कमनीयं जलम् ॥५॥
अन्वय : हे वायो ! त्वं हव्यदातये वीतयेऽभि प्रयो जुषाण आ याहि सुतस्यान्धसः पिबा ॥५॥
भावार्थ : हे विद्वंस्त्वं रोगप्रमादनाशकं बुद्धिवर्द्धकमन्नं भुङ्क्ष्व रसं पिब ॥५॥