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Rigveda / 5 / 51 / 8

स॒जूर्विश्वे॑भिर्दे॒वेभि॑र॒श्विभ्या॑मु॒षसा॑ स॒जूः। आ या॑ह्यग्ने अत्रि॒वत्सु॒ते र॑ण ॥८॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 51 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : स्वस्त्यात्रेयः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : अब अग्नि के समान विद्वान् कैसा है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : स॒ऽजूः। विश्वे॑भिः। दे॒वेभिः॑। अ॒श्विऽभ्या॑म्। उ॒षसा॑। स॒ऽजूः। आ। या॒हि॒। अ॒ग्ने॒। अ॒त्रि॒ऽवत्। सु॒ते। र॒ण॒ ॥८॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी विद्वन् ! जैसे अग्नि (विश्वेभिः) सम्पूर्ण (देवेभिः) पृथिवी आदिकों से (सजूः) संयुक्त तथा (अश्विभ्याम्) प्रकाशित और अप्रकाशित लोकों तथा (उषसा) प्रातःकाल से (सजूः) संयुक्त (सुते) उत्पन्न जगत् में (अत्रिवत्) व्यापक के सदृश है, वैसे (आ, याहि) प्राप्त हूजिये और (रण) उपदेश करिये ॥८॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो ! जो बिजुली सब पदार्थों में व्याप्त है, उसको विशेष करके जानिये ॥८॥