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Rigveda / 5 / 51 / 14

स्व॒स्ति मि॑त्रावरुणा स्व॒स्ति प॑थ्ये रेवति। स्व॒स्ति न॒ इन्द्र॑श्चा॒ग्निश्च॑ स्व॒स्ति नो॑ अदिते कृधि ॥१४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 51 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : स्वस्त्यात्रेयः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : स्व॒स्ति। मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒। स्व॒स्ति। प॒थ्ये॒। रे॒व॒ति॒। स्व॒स्ति। नः॒। इन्द्रः॑। च॒। अ॒ग्निः। च॒। स्व॒स्ति। नः॒। अ॒दि॒ते॒। कृ॒धि॒ ॥१४॥

पदार्थ : हे (अदिते) खण्डितविद्या से रहित (रेवति) बहुत धन से युक्त ! आप (पथ्ये) मार्गयुक्त कर्म्म में जैसे (मित्रावरुणा) प्राण और उदान (नः) हम लोगों के लिये (स्वस्ति) सुख (इन्द्रः, च) और वायु (स्वस्ति) सुख को (अग्निः, च) और बिजुली (स्वस्ति) सुख (नः) हम लोगों के लिये करती है, वैसे (स्वस्ति) सुख (कृधि) करिये ॥१४॥

भावार्थ : जो सब जीवों के लिये सुख देता है, वही विद्वान् प्रशंसित होता है ॥१४॥