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Rigveda / 5 / 52 / 5

अर्ह॑न्तो॒ ये सु॒दान॑वो॒ नरो॒ असा॑मिशवसः। प्र य॒ज्ञं य॒ज्ञिये॑भ्यो दि॒वो अ॑र्चा म॒रुद्भ्यः॑ ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 52 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : मरुतः | छन्द : विराडुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अर्ह॑न्तः। ये। सु॒ऽदान॑वः। नरः॑। असा॑मिऽशवसः। प्र। य॒ज्ञम्। य॒ज्ञिये॑भ्यः। दि॒वः। अ॒र्च॒। म॒रुत्ऽभ्यः॑ ॥५॥

पदार्थ : हे विद्वन् ! (ये) जो (यज्ञियेभ्यः) यज्ञ करनेवालों के लिये (यज्ञम्) सत्कार नामक कर्म्म की (अर्हन्तः) योग्यता को प्राप्त होते हुए (सुदानवः) उत्तम दान देनेवाले (असामिशवसः) अखण्डित बलयुक्त (नरः) जन (दिवः) कामना करते हुए (मरुद्भ्यः) मनुष्यों के लिये सत्कार नामक कर्म्म को सिद्ध करते हैं, उनका आप (प्र, अर्चा) सत्कार करिये ॥५॥

भावार्थ : मनुष्य जितने बल बढ़ाने की इच्छा करें, उतना ही बढ़ सकता है ॥५॥